Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 1, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 1, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
गृहान्तरं प्रविष्टेषु गवाक्षे दूरमंशुषु ।
विश्रामार्थमिवादीर्घं नभःपान्थेषु शीतलम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
इस समय यदि मैं आपसे कहूँगा भी, तो वह आपके चित्त में आरूढ़ नहीं होगा, इस आशय से
कहते हैं ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे युवा पुरुष प्रेयसी के गीतों का पात्र होता है वैस ही सम्पूर्ण कर्म फलों
की अवधिरूप आत्मज्ञान वाला पुरुष इन प्रश्नों के उत्तर वाक्यों का भाजन होता है