Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, Verses 6–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 6,7
संस्कृत श्लोक
चिदर्णवप्रतिष्ठा चिद्धातवो धातुषु स्थिताः ।
स्वे स्वरूपे स्थितं सर्वं मुनावुपशमं गते ॥ ६ ॥
एषा ते कथिता राम विचारशतशालिनी ।
विश्रान्तिर्वीतहव्यस्य प्रज्ञयैनां विवेचय ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
(उस प्रकार के अनेक शुभ
विशेषणो से सम्पन्न महामुनि वीतहव्य ने पूर्वोक्त रीति से अध्यारोप ओर अपवाद से समस्त कल्पनाओं
का परित्याग कर विशुद्धि आदि गुणों से युक्त तथा) तेज ओर तम दोनों के समूह से रहित; सूर्य, चन्द्र
ओर ताराओं से शून्य; धूम्र, अभ्र ओर धूलि से वर्जित; शरत्कालीन आकाश के समान अत्यन्त स्वच्छ;
असीम ब्रह्मात्मा का साक्षात्कार कर प्रणव के अग्रभाग के दीर्घनादरूपी सूत्र के साथ ही इन्द्रिय ओर
शब्दादि तन्मात्राओं के जाल को उस प्रकार त्याग दिया, जिस प्रकार वायु ने गन्ध को त्याग दिया
हो