Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
वीतहव्यात्मिका संवित्संकल्पजगतीति सा ।
अनुभूतवती दृश्यमिदमेव च तज्जगत् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर समर्थ मुनि वीतहव्य पहले उक्त सुषुप्त स्थान में किंचित् किचित् स्थित होकर अनन्तर
उसमें स्थिरता को प्राप्तकर तुर्य रूप में लीन हो गये। 'तुर्यरूप मुपाययौ” इस वाक्य से पहले सदेहावस्थ
छठी ओर सप्तम भूमिका को बतलाकर साक्षी की सदेकरसता सिद्ध हो जाने पर निरतिशय अखण्ड
आनन्द के आविर्भाव से अवशिष्ट प्रारब्ध के साथ जगत्-प्रतिभास का आत्यन्तिक विनाश आरे तदनन्तर
विदेह कैवल्य की प्राप्ति बतलाई गई हे