Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 82, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 82, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
एतां दृष्टिमवष्टभ्य विचारपरया धिया ।
संसारसागरादस्मात्तारतम्येन संतर ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस चित्त के द्वारा "यह समस्त जगत् आत्मस्वरूप
ही है” इस प्रकार के परोक्ष साक्षात्कार से जगत् परिमार्जित किया गया है, वह चित्त कहाँ से उत्पन्न
हुआ ? यह अत्यन्त आश्चर्य है, क्योकि जगत् के अवस्तुस्वरूप होने से उसके अन्तर्गत हुआ चित्त भी
स्वयं अवस्तुस्वरूप ही हे