Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 65, Verses 14–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 65, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
पुष्पाभ्रसंवीतवपुः पुष्परेण्वभ्रपांसुलः ।
पुष्पवात्याभ्रहृद्भ्रान्तः पुष्पपादपपाण्डुरः ॥ १४ ॥
धातुधूल्यभ्रकपिलो रत्नोपलतलस्थितैः ।
मन्दारगैरिव पुरस्त्रीगणैरलमाश्रितः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
उस पर्वत का शरीर
नीचे गिरे हुए पुष्परूपी अभ्रों से आच्छादित, तत्क्षण गिरे हुए पुष्पों का अन्तरिक्षस्थ धूलिरूपी अभ्र से
धूलीमय, गिर रहे (उड़ रहे) पुष्पों के झंझावातरूपी भ्रम से भ्रान्त-हृदय तथा पुष्पों के वृक्षों से धवलवर्ण
है। वह अनेक तरह की धातुओं की धूलिरूपी अभो से कपिलवर्ष और रत्नों की शिलाओं के ऊपर
अवस्थित मन्दार वृक्ष के (कल्पवृक्ष विशेष के) ऊपर आरूढ सिद्ध स्त्रियों की नाई मनोहर नगर कि
अंगनाओं का चारों ओर से आश्रयस्थान है