Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 23, Verses 25–29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 23, verses 25–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 25-29
संस्कृत श्लोक
तस्मिन्नभ्युदिते सूर्ये त्रैलोक्यकमलाकराः ।
इमे विकासमायान्ति विलीयन्तेऽस्तमागते ॥ २५ ॥
तमेवमेकया बुद्ध्या व्यामोहपरिहीनया ।
यदि जेतुं समर्थोऽसि धीरस्तदसि सुव्रत ॥ २६ ॥
तस्मिञ्जिते जिता लोका भविष्यन्त्यजिता अपि ।
अजिते त्वजिता एते चिरकालजिता अपि ॥ २७ ॥
तस्मादनन्तसिद्ध्यर्थं शाश्वताय सुखाय च ।
तज्जये यत्नमातिष्ठ कष्टयापि हि चेष्टया ॥ २८ ॥
ससुरदनुजनागयक्षसंघं सनरमहोरगकिन्नरं समेतम् ।
त्रिजगदपि वशीकृतं समन्तादतिबलिना ननु हेलयैव तेन ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें सबको जीतने की केवल शक्ति ही नहीं है, किन्तु त्रैलोक्य को उत्पन्न करने की शक्ति भी
है, ऐसा कहते हैं।
सूर्य रूपी उस मन्त्री का उदय होने पर ये त्रिलोकरूपी कमल-तलाब विकास को प्राप्त होते हैं और
उसके अस्त होने पर विलीन हो जाते हैं । व्यामोहरहित एकाग्र बुद्धि से उसे इस प्रकार जीतने के लिए
यदि तुम समर्थ हो तो हे सुव्रत, तुम धीर हो उसके ऊपर विजय प्राप्त होने पर अजित लोग भी विजित
हो जाते हैं। यदि उस पर विजय प्राप्त न हुई, तो जो चिरकाल से विजित हैं, वे लोग भी अविजित ही हँ ।
इसलिए मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए और अक्षय सुख के लिए श्रम से होनेवाली सर्वत्याग आदि
चेष्टा द्वारा भी उस पर विजय पाने के लिए यत्नवान् होओ | अतिबलशाली उसने अनायास ही देवता,
दानव, नाग और यक्षों के समूहों से युक्त तथा मनुष्य, सर्प और किन्नरोंसहित सारे त्रैलोक्य को चारों
ओर से अपने वश में किया हे