Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
प्रणम्याथ नृपं भूपा निर्ययुर्नृपमन्दिरात् ।
शक्रचापीकृता रत्नैरम्बुधेरिववीचयः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
सैकड़ों
राजाओं से व्याप्त, विस्तृत वह सभा सैकड़ों पर्वतो से व्याप्त प्राणियों की परम्पराओं से पूर्ण नूतन
उत्पन्न हुई सृष्टि के समान थी ॥ ३ १॥ तदनन्तर मणियों द्वारा इन्द्रधनुष के तुल्य बनाए गये राजा लोग
राजा दशरथ को प्रणाम कर जैसे मणियों द्वारा इन्द्रधनुष के तुल्य बनाई गई तरंगें सागर से निकलती हैं
वैसे ही राजमन्दिर से निकले