Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, Verses 16–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, verses 16–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 16-18
संस्कृत श्लोक
मुनिरन्तरयांचक्रे स्वां वाचमथ संसदि ।
जितसारो गुणः केन महता समुदीर्यते ॥ १६ ॥
मुहूर्तमात्रं विश्रम्य श्रुत्वा मध्याह्ननिःस्वनम् ।
घने कोलाहले शान्ते रामं मुनिरुवाच ह ॥ १७ ॥
रामाद्यतनमेतावदाह्णिकं कथितं मया ।
प्रातरन्यत्तु वक्ष्यामो वक्तव्यमरिमर्दन ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त मुनि ने सभा में अपनी उपदेश वाणियों का उपसंहार किया। जिस गुण
का जनों को आह्नादित करनेवाला अंश अभिभूत हो गया हैं, उसे कौन गुणी पुरुष प्रकट करेगा ! भाव
यह हे कि मध्याहकालीन शंखों की ध्वनि से लोगों का मन चंचल हो उठा था, अतएव उन्होने अपने
उपदेश वचनों में लोगों की एकाग्रता न देखकर उसका उपसंहार किया । मध्याहकाल की शंखध्वनि
सुनकर मुहूर्तभर विश्राम करके घन कोलाहल के शान्त होने पर श्रीवसिष्ठजी ने श्रीरामचन्द्रजी से
कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, आज का इतना ही आह्ििक मैंने कहा, हे शत्रुतापन, शेष वक्तव्य कल प्रातःकाल
कर्हुगा