Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 62, Verses 16–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 62, verses 16–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 16-19
संस्कृत श्लोक
स्वविवेकवशाद्यान्ति सन्तः सात्त्विकजातिताम् ।
अतश्चित्तमणौ स्वच्छे यद्राघव नियोज्यते ॥ १६ ॥
तन्मयो विभवत्येवं तस्माद्भवति पौरुषम् ।
पौरुषेण प्रयत्नेनमहार्हगुणशालिनः ॥ १७ ॥
मुमुक्षवो भवन्तीह पाश्चात्यशुभजातयः ।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा क्वचित् ॥ १८ ॥
पौरुषेण प्रयत्नेन यन्नाप्नोति गुणान्वितः ।
ब्रह्मचर्येण धैर्येण वीर्यवैराग्यरंहसा ।
युक्त्या युक्तेन हि विना न प्राप्नोषि तदीहितम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त बात को ही विस्तार से कहते हैं।
अपने विवेक से ही सन्त लोग देवता आदि सात्विक योनि को प्राप्त होते हैं, इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी,
निर्मल चित्तरूपी मणि को जिस वस्तु का संसर्ग होता है, वह चित्तरूपी मणि तन्मय हो जाती है,
इसलिए पौरुष ही प्रधान हे । पौरुष प्रयत्न से ही बड़े उत्तम गुणों से अलंकृत मुमुक्षु पुरुष पाश्चात्य यानी
जीवन्मुक्त उत्तम शरीरवाले होते हैँ । न कोई ऐसी वस्तु पृथ्वी में है, न स्वर्ग मे, न देवताओं के पास
अथवा न अन्यत्र कहीं हे, जिसे गुणवान पुरुष अपने पौरुष प्रयत्न से हस्तगत न कर ले । युक्ति के
सहित ब्रह्मचर्य, धैर्य, वीर्य ओर वैराग्य के वेग के बिना आप उस अभीष्ट वस्तु को प्राप्त नहीं कर
सकते