Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 58
सत्तावनवाँ सर्ग समाप्त अट्टावनवाँ सर्ग पूर्ण पद में आरुढ़ हुए पुरुष के सर्वात्मत्व का बोध करानेवाली कच गाथा का श्रीवसिष्ठजी द्वारा श्रीरामचन्द्रजी को उपदेश ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : इसी पूर्वोक्त वस्तु के विषय में कही गई पूर्वकाल की जो गाथा बृहस्पति…
- Verse 2मेरु के किसी वन में सुरगुरु के पुत्र कच रहते थे । कभी शुद्ध ब्रह्मविद्या के मनन निदिध्यास…
- Verse 3उनकी आत्मज्ञान के अमृत से परिपूर्ण वह मति पंचभूतों से निर्मित, अनादर के योग्य इस मिथ्या द…
- Verses 4–5दृश्य में न रमने के कारण सद्रूप एेकात्म्य से अतिरिक्त वस्तुको न देखते हुए, एकमात्र आत्मवस…
- Verse 6यदि कोई कहे, जीवात्मा के जो सुख साधन हैं, उन्हें करो, वे सुख साधन जहाँ प्राप्त हो वहाँ जा…
- Verse 7भी हे : "आत्मेवाऽधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत…
- Verse 8सभी जगह अधिष्ठानरूप से आत्मा स्थित है । विवर्तरूप कल्पित विकार के दर्शन से सब आत्ममय ही ह…
- Verse 9जो चेतनरूप से प्रसिद्ध है ओर जो अचेतनरूप से प्रसिद्ध है, वह सब सन्मय, अपार आकाश को पूर्ण…
- Verse 10आनन्दरूप एकमात्र सागर के तुल्य में सर्वत्र सुखपूर्वक स्थित हूँ, इस प्रकार मेरु पर्वत के न…
- Verse 11विशुद्ध आत्मा को उन्होने किस प्रमाण से देखा, इस पर कहते हैं। क्रमशः घण्टानाद की तरह ॐकार…
- Verse 12उसी स्थिति को दशति हुए उपसंहार करते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, कल्पनारूपी कलंक से रहित अतएव…