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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 51, Verses 7–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 51, verses 7–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 7-15

संस्कृत श्लोक

ततो विशीर्णावरणो विगलद्वासनामलः । स ददर्शैकदा तस्यां लतायामग्रतः स्थिताम् ॥ ७ ॥ वनदेवीं विशालाक्षीमालोककुसुमाम्बराम् । कामिनीं कान्तवदनां मदघूर्णितलोचनाम् ॥ ८ ॥ नीलोत्पलामोदवतीमतीव सुमनोहराम् । तामुवाचानवद्याङ्गीं स मुनिर्विनताननाम् ॥ ९ ॥ कोकिलाकुसुमापूरनतां वनलतामिव । का त्वमुत्पलपत्राक्षि कान्तिविक्षोभितस्मरा ॥ १० ॥ वयस्यामिव पुष्पाढ्यां लतां किमिव तिष्ठसि । इत्युक्ते मृगशावाक्षी गौरपीनपयोधरा ॥ ११ ॥ मुनिमाह मनोहारि मुग्धाक्षरमिदं वचः । यानि यानि दुरापानि वाञ्छितानि महीतले ॥ १२ ॥ प्राप्यन्ते तानि तान्याशु महतामेव याच्ञया । अहमस्मिँल्लताकीर्णे त्वत्कदम्बाभ्यलंकृते ॥ १३ ॥ लतालीलालया ब्रह्मन्विपिने वनदेवता । यश्चैत्रसितपक्षस्य त्रयोदश्यां स्मरोत्सवे ॥ १४ ॥ बभूव वनदेवीनां समाजो नन्दने वने । तत्राहमगमं नाथ त्रैलोक्यललनासदः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञान होने के बाद उनका अज्ञानरूप आवरण छिन्न- भिन्न हो गया और वासना के हट जाने से वे निर्मल हो गये । उन्होंने एक समय उस शाखा के अग्रभाग में बैठी हुई, प्रकाशमान पुष्परूप वस्त्रों से आवृत विशालाक्षी वनदेवी को देखा । उसका मुख बड़ा सुन्दर था, मद से उसके नेत्र घूम रहे थे, नीलकमलों की सुगन्ध से वह सुगन्धित थी एवं उसका रूप अत्यन्त मनोहर था । निर्दोष अंगवाली कोकिला और फूलों के समूहों से झुकी हुई वनलता के समान नम्रमुखी उस कामिनी से मुनि ने कहा : हे कमलपत्राक्षी, अपनी कान्ति से कामदेव को भी क्षोभित करनेवाली तुम कौन हो, फूलों से लदी हुई शाखा को सखी की नाई परखकर तुम क्यों खडी हो ? मुनि के ऐसा कहने पर मृग के समान नेत्रवाली, गौर ओर विशाल स्तनवाली वनदेवी ने मुनि से कोमल अक्षरों से युक्त यह मनोहर वचन कहा : भगवन्‌, इस पृथिवीतल में जो-जो दुष्प्राप्त वांछित है, वे सब महापुरुषों की ही प्रार्थना से शीघ्र प्राप्त होते हैं । हे ब्रह्मन्‌, लताओं से व्याप्त और आपके कदम्बवृक्ष से सुशोभित इस वन में रहने वाली मैं वनदेवी हूँ। लता निकुज ही मेरे क्रीडागृह हैं । नन्दनवन में चैत्र शुक्लपक्ष की त्रयोदशी के दिन स्व के अभ्यास के लिए प्रवर्तित गाना, बजाना, नाचना, भोज आदि के उत्सव में जो वनदेवियों का सम्मेलन हुआ था। हे नाथ, वहाँ त्रैलोक्य की महिलाओं के समाज में मैं गयी