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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 51, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 51, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

अनुभववशतो रसातिरिक्तैरलमुचितार्थवचोगणैर्महात्मा । जलद इव शिखण्डिनं पुरःस्थं तनयमबोधयदम्बरे महर्षिः ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मबोध के चमत्कार से सब रसों से बढ़े हुए, परम पुरुषार्थरूप होने के कारण अवश्य बोधयोग्य अर्थवाले वचनों से वह महात्मा आगे स्थित पुत्र को वृक्ष के अग्रभाग में ऐसे प्रबुद्ध करते थे, जैसे कि श्रवणमात्र से मयूरो को आनन्द उत्पन्न करने के कारण अन्य रसों से बढ़ी-चढ़ी गर्जनाओं द्वारा मेघ आकाश में आगे स्थित मयूर को प्रबुद्ध करता हे