Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 50, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 50, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
तमथासौ तथा बुद्धिफलपल्लवशालिनम् ।
आनन्दमन्थरमनाः षुष्परूपाचलोपमम् ॥ १ ॥
कदम्बं रोदसीस्तम्भमारुरोह वनस्थितम् ।
एकार्णवगतं शौरिर्वटवृक्षमिवोन्नतम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर भूमि में अपवित्र बुद्धिवाले, आनन्द से प्रफुल्लितचित्त दाशूर फल- पल्लवं से शोभायमान
पुष्परूपी पर्वत के सदृश, अन्तरिक्ष ओर पृथिवी के स्तम्भरूप उस कदम्बवृक्ष पर जैसे एकमात्र सागर में
स्थित ऊँचे वट वृक्ष पर भगवान विष्णु चढते हैं वैसे ही चढ़े
सर्ग सन्दर्भ
उनचासवाँ सर्ग समाप्त पचासवाँ सर्ग उस कदम्ब के वृक्षों की चोटी पर बैठे हुए दाशूर द्वारा देखी गयी दिशारूपी वनिताओं का गुणों के साथ वर्णन |