Guru's AddaGuru's Adda

Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 50

उनचासवाँ सर्ग समाप्त पचासवाँ सर्ग उस कदम्ब के वृक्षों की चोटी पर बैठे हुए दाशूर द्वारा देखी गयी दिशारूपी वनिताओं का गुणों के साथ वर्णन |

10 verse-groups

  1. Verses 1–2तदनन्तर भूमि में अपवित्र बुद्धिवाले, आनन्द से प्रफुल्लितचित्त दाशूर फल- पल्लवं से शोभायमा…
  2. Verse 3एकाग्र तप में स्थित वे वहाँ पर आकाश से सटी हुई शाखा की चोटी के पल्लव पर निःशंक होकर बैठे
  3. Verse 4तदनन्तर कोमल नव नव पल्वरूपी आसन पर बैठकर कौतुकवश चंचल दृष्टि होकर उन्होने एकक्षण भर दिशाए…
  4. Verses 5–6वे नदी रूपी एकावली से रमणीय थी, पर्वतराज ही उनके स्तन थे, निर्मल आकाश ही उनकी केशराशि थी,…
  5. Verse 7खिले हुए कमल के तालाब उन्होने धारण कर रक्खे थे, उनके मुख के निःश्वास वायु सुगन्धित थे भँव…
  6. Verse 8द्युलोक ही उनका मस्तक था, पृथिवी उनकी चरणरूप थी । वृक्ष पंक्तियाँ ही उनकी रोमराशिर्यो थी,…
  7. Verse 9धान आदि के कम्प से चंचल हो रहे खेत ही उनके अंगविलास थे, उनके ललाट चन्दन से पूर्ण थे, पर्व…
  8. Verse 10महासागर की जलराशि ही नूतन अलंकारो को देखने के लिए उनके दर्पण थे नक्षत्रपंक्तियाँ ही उनके…
  9. Verse 11तत्‌ तत्‌ ऋतुओं में उत्पन्न होनेवाले फूल, पल्लव आदि ही स्तन वस्त्र (चोली) थे, सूर्यकिरणरू…
  10. Verse 12आकाश में फैली हुई शाखा के पत्तों पर बैठे हुए सन्तुष्ट दाशूर ने दस दिशाओं को देखा । विस्तृ…