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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 34, Verses 15–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 34, verses 15–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 15-18

संस्कृत श्लोक

ततस्तैर्निरहंकारैर्जरामरणनिर्भयैः । प्राप्तार्थकारिभिर्धीरैर्वर्तमानानुसारिभिः ॥ १५ ॥ असक्तबुद्धिभिर्नित्यं हतान्यैरप्यहन्तृभिः । वासनाजालनिर्मुक्तैः कृतकार्यैरकर्तृभिः ॥ १६ ॥ प्रभोः कार्यमिदं कार्यमिति संगरतत्परैः । वीतरागैर्गतद्वेषैः सर्वदा समदृष्टिभिः ॥ १७ ॥ सा दैवी दानवैः सेना भीमभासदृढादिभिः । हता भुक्ता हृता पुष्टा स्वान्नश्रीरिव भोक्तृभिः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर अहंकाररहित, जरा-मरण से निर्भय, जो वस्तु प्राप्त हो उसे करनेवाले, वर्तमान का अनुसरण करनेवाले, धैर्यशाली, नित्य आसक्तिरहित बुद्धिवाले, दूसरों को मारकर भी हन्तृत्व का अभिमान न करने से हन्तृत्व से निर्मुक्त, अज्ञानी अपने प्रभु शम्बर की दृष्टि से यह कार्य करना चाहिये, यों युद्ध में सन्नद्ध हुए, राग-द्वेषशून्य, सदा सर्वत्र समदुष्टि, भीम, भास और दृढ़ आदि दानवो द्वारा जैसे भोक्ता पुरुषों से अपनी-अपनी खाद्य वस्तुओं की शोभा नष्ट होती है, उपभुक्त होती है, वैसे ही उसके द्वारा देवताओं की सेना नष्ट हुई, उपभुक्त हुई, हरी गई ओर जलाई गई