Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 30, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 30, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति तुष्टेषु देवेषु दानवेषु हतेषु च ।
दामव्यालकटा दीना बभूवुर्भयविह्वलाः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे वर्षाऋतु में जल में
(४५) गंगाजी हजार मुँहों से समुद्र में प्रवेश करती हैं, इसलिए एक भी समुद्र प्रदेशभेद से नाना
कहा गया है ।
धूलिकण नाश को प्राप्त होते है, वैसे ही इस प्रकार सभी असुरनायक सब शस्त्रों के समाप्त होने के
अनन्तर ही दिशाओं में नाश को प्राप्त हो गये॥ ३ ४॥
उनतीसवाँ सर्ग समाप्त
तीसवाँ सर्ग
पाताल में यमराज से जलाये गये दाम आदि की काश्मीर देश में
मछली होने तक जन्मपरम्पराओं के वर्णन ।
वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह दानवों के नष्ट हो जाने पर और देवताओं के
सन्तुष्ट होने पर अत्यन्त खिन्न हुए दाम, व्याल ओर कट शम्बर के भय से व्याकुल हो गये