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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 25, Verse 38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 25, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

कर्मजीवकलां तन्वीमसारां च मनोभिदाम् । अपुष्टां कृत्रिमामन्तश्चोदयोदयमागताः ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राक्तन कर्मो का अभाव होने से वे प्राक्तन (पूर्वसिद्ध जीव) न थे ओर न उनकी वासनाएँ थी, वे भय, शंका, पलायन आदि विकल्पों से रहित चिन्मात्र के सन्निधान के कारण देह क्रियावाले थे ॥ ३ ७॥ यदि कोई शंका करे कि यदि उनके कर्म, काम और वासनाएँ नहीं थी, तो उनका जन्म ही नहीं होना चाहिये था, क्योकि जन्म के हेतुओ का अभाव था। यदि कहिये, बीज न होने पर भी जन्म होगा, तव तो मुक्तो का भी पुनर्जन्म होगा । आगे स्वयं कहेंगे भी 'विद्यतेवासना यत्र तत्र सा याति पीनताम्‌” (जहाँ पर वासना रहती है वहीं पर वह स्थूलता को प्राप्त होती है) इसलिए उनके कर्म आदि का अभाव कहना संगत प्रतीत नहीं होता इस पर कहते है । ये दाम, व्याल और कट स्वतन्त्र जीव न थे, किन्तु निमित्तभूत अन्तर्यामी चैतन्य से कर्मजीवरूप शम्बर की कौशलरूप, कर्म, वासना आदि से वृद्धि को प्राप्त न हुई, माया कल्पनारूप अतएव भोगसाररहित थोडी सी सृष्टि संकल्पवृत्ति को लेकर आविर्भाव को प्राप्त हुए थे । ऐन्द्रजालिकों द्वारा रचे गये अन्य पुरुषों की तरह स्वतन्त्र कर्मो का अभाव होने पर भी आविर्भाव रूप जन्म हो सकता हे । यह भाव है