Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 83, Verses 3–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 83, verses 3–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 3-7
संस्कृत श्लोक
बहुवर्षगणेनैषा ध्यानाद्विरतिमागता ।
तत्रागत्य समस्तांस्तान्वध्याञ्जन्तून्सुसंचितान् ॥ ३ ॥
अद्यापि तत्र ये वध्यास्ते तदर्थं महीभुजा ।
नीयन्ते मित्रसन्माने के हि नाध्यवसायिनः ॥ ४ ॥
तस्यां ध्याननिषण्णायां किरातजनमण्डले ।
अनायान्त्यां चिरं कालं जनैर्दोषप्रशान्तये ॥ ५ ॥
सा देवी कन्दरानाम्नी मङ्गलेतरनामिका ।
संप्रतिष्ठापिता मूर्त्या पुरे गगनकोटरे ॥ ६ ॥
ततःप्रभृति तत्रत्यो यो यो भवति भूमिपः ।
स कन्दरां भगवतीं प्रतिष्ठापयति स्वयम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
बहुत वर्षो के बाद ध्यान से विरत हुई वह किरातमण्डल मेँ आकर इकडे किये हुए
समस्त वध्य जन्तुओं को खाती हे । आज भी वहाँ पर जो लोग वध्य होते हैं, उन्हें राजा उसके
लिए ले आता हे । अपने मित्रका सन्मान करने के लिए कौन उद्योगशील नहीं होता ? उसके
ध्यान में बैठ जाने पर ओर किरातमण्डलमें चिरकाल तक न आने पर लोगों ने विविध दोषों की
शान्ति के लिए कन्दरा नामकी उस देवीकी, जिसका दूसरा नाम मंगला था, नगर में गगनचुम्बी
राजमहल के ऊपर मूर्तिरूप से स्थापना की । तबसे लेकर उस मण्डलका जो भी राजा होता
है, वह भगवती कन्दरा की प्रतिष्ठा करता है यानी काल से पूर्वप्रतिमा के नष्ट होने पर नयी
प्रतिमाकी स्थापना करता है