Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 68, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 68, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
राक्षस्योक्तं महाप्रश्नजालमावलिताखिलम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्व में जिसका वर्णन किया गया है, उस सृष्टिक्रम का लोक भी ठीक ऐसे ही स्वप्न में
अनुभव करते हैं, ऐसा कहते हैं।
मन जिस वस्तु की कल्पना करता है, उसको देखता है।
शंका - स्वप्न के पदार्थप्रातिभासिक असत् होते हैं, वे व्यावहारिक सत् पदार्थों के दृष्टान्त
कैसे हो सकते हैं ?
समाधान - चिरकाल से उस पदार्थ की भावना से युक्त चित्त जिस वस्तु की कल्पना
करता है, वह सत् हो चाहे असत् हो, उसको अवश्य देखता है । दर्शन से सत्य के समान
प्रतिभासित हुआ वह शीघ्र व्यवहारोपयोगी बन जायेगा ॥ ८ २॥
सड़सठवाँ सर्ग समाप्त
अड़सठवाँ सर्ग
कर्कटीनामक राक्षसी का तथा सम्पूर्ण प्राणियों को मारने की इच्छा से की गई
उसकी उग्र तपस्या का वर्णन ।
विस्तार और संक्षेप से पहले वर्णित अर्थ को दृढ़ करने के लिए कर्कट्युपाख्यान” नामक
इतिहास द्वारा राक्षसीका किरातराज तथा मन्त्री के साथ हुए संवाद को कहने की इच्छा से
कर्कट्युपाख्यान का अवतरण करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी इसी विषयमें राक्षसी द्वारा कथित अनेक प्रश्नों
से युक्त इस प्राचीन इतिहास को कहते हैं, जिसमें कि तात्त्विक विचारसे सम्पूर्ण जगत् स्थित
है