Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 6, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 6, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अस्य देवाधिदेवस्य परस्य परमात्मनः ।
ज्ञानादेव परा सिद्धिर्न त्वनुष्ठानदुःखतः ॥ १ ॥
अत्र ज्ञानमनुष्ठानं नत्वन्यदुपयुज्यते ।
मृगतृष्णाजलभ्रान्तिशान्तौ चेदं निरूपितम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
पाँचवाँ सर्गे समाप्त
छठा सर्ग
ज्ञान से आत्मा की प्राप्ति होती है, कर्मो से नहीं;
अतएव ज्ञानप्राप्ति के उपायों में प्रयत्न और क्रम का वर्णन |
पूर्वोक्त रीति से जगत् के मूलकारण देवाधिदेवका वर्णन कर उसकी प्राप्ति के उपाय भूत
ज्ञान के साधनों को कहने की इच्छा से श्रीवसिष्ठजी बोले :
वत्स, देवों के देव (>>) इस परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति ज्ञान से ही हो सकती है, कर्मानुष्ठान
से उत्पन्न क्लेशो से इसकी प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती । ब्रह्म की प्राप्ति में ज्ञानरूपी
अनुष्ठान का ही उपयोग है, ज्ञान से अतिरिक्त कर्म आदि का कोई उपयोग नहीं है । मरुस्थल
में मरीचिका में जलभ्रम की निवृत्ति कोटि-कोटि कर्म करनेपर भी नहीं हो सकती, एकमात्र
ज्ञान ही उसकी निवृत्ति में कारण देखा गया है