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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

न जगत्तत्र नो सर्गः कश्चिदप्यनुभूयते । तेनाहमजमाकाशं जगदित्येव वर्तते ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ पर तत्त्वज्ञ पुरुषों को न तो जगत्‌ की प्रतीति होती हे ओर न किसी सृष्टि का ही अनुभव होता है, उक्त तत्त्वज्ञं के अनुभवरूप प्रत्यक्ष प्रमाण से यह निश्चित होता है कि अहंकार का साक्षीरूप अविनाशी चिदाकाश ही अज्ञानी की दृष्टि से जगत्‌-रूप से स्थित हे