Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, Verses 42–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, verses 42–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 42-49
संस्कृत श्लोक
अथान्यं रथमानीतं कृच्छ्रेण प्राप्य चेतनाम् ।
खङ्गेनारोहतोऽस्यांसं छिन्नं भर्तुर्विलोकय ॥ ४२ ॥
पद्मरागगिरिद्योतमिवर्द्धासृग्विमुञ्चति ।
हा हा धिक्कष्टमेतेन सिन्धुना खड्गधारया ॥ ४३ ॥
जङ्घयोर्मे पतिश्छिन्नः क्रकचेनेव पादपः ।
हा हा हतास्मि दग्धास्मि मृतास्म्युपहतास्मि च ॥ ४४ ॥
मृणाले इव पत्युर्मे लूने द्वे अपि जानुनी ।
इत्युक्त्वा सा तदालोक्य भर्तुर्भावभयातुरा ॥ ४५ ॥
लता परशुकृत्तेव मूर्च्छिता भुवि सापतत् ।
विदूरथोऽपि निर्जानुः प्रहरन्नेव विद्विषि ॥ ४६ ॥
पपात स्यन्दनस्याधश्छिन्नमूल इव द्रुमः ।
पतन्नेवैष सूतेन रथेनैवापवाहितः ॥ ४७ ॥
यदा तदाहतिं तस्य कण्ठेऽदात्सिन्धुरुद्धतः ।
अर्धविच्छिन्नकण्ठोऽसावनुयातोऽथ सिन्धुना ॥ ४८ ॥
स्यन्दनेनाविशत्सद्म पद्मं रविकरो यथा ।
सरस्वत्याः प्रभावाढ्यं तत्प्रवेष्टुमसौ गृहम् ।
नाशकन्मशको मत्तो महाज्वालोदरं यथा ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
बड़े क्लेश से होश में आकर सारथि द्वारा लाये गये अन्य रथ में चढ़ रहे
हमारे पति के सिन्धु द्वारा तलवार से काटे गये कन्धे को देखो । कन्धा कटने के कारण हमारे
पति, जैसे घन से तोड़े गये पद्यरागमणिके पर्वत से लाल कान्ति निकलती है वैसे ही, खूब
रुधिर बहा रहे है । ओ हो, अब तो बड़ा भारी कष्ट आया, जैसे आरे से वृक्ष काटा जाता है
वैसे ही इस सिन्धु ने तीखी तलवार की धार से हमारे पति की पिण्डलिर्योँ काट डाली । हा,
मैं मारी गई हूँ, जलाई गई हूँ, मर गई हूँ और लथेडी गयी ह । मेरे पति की दोनों जंघाएँ
कमलनाल की नाई काट दी गई हैं ।* - ऐसा कहकर पति की अवस्था को देखकर दु:खी हुई
और पति के प्रति उसका जो अत्यन्त प्रेम था, उससे और भय से कातर होकर वह कुल्हाड़े
से काटी गई लता की नाई मूर्छित होकर पृथिवी पर गिर पड़ी । यद्यपि विदूरथ की दोनों जंघाएँ
कट गयी थी, तथापि शत्रु पर प्रहार करता हुआ ही वह छिन्नमूल (जिसकी जड़ कट गई
हो) वृक्ष की भाँति रथ के नीचे गिरने को तैयार हुआ । वह गिरना ही चाहता था कि सारथि
उसे सँभालकर रथ से ही घर की ओर भगा ले गया (2) । जब सारथि राजा विदूरथ को
भगा ले गया तब उद्दण्ड राजा सिन्धु ने विदूरथ के कंठ में तलवार से वार किया। तलवार के
वार से उनका आधा कंठ कट गया तदनन्तर आधे कटे गलेवाले विदूरथ का सिन्धु ने पीछा
किया । राजा विदूरथ जैसे सूर्य की किरणें कमल में प्रवेश करती हैं, वैसे ही अपने घर में
प्रविष्ट हुआ, लेकिन राजा सिन्धु सरस्वती के प्रभाव से परिपूर्ण उस घर में ऐसे प्रवेश नहीं
कर सका जैसे कि मदोन्मत्त मच्छर महाज्वाला के भीतर नहीं घुस सकता