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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । तस्मिंस्तदा वर्तमाने घोरे समरविभ्रमे । सर्वारिसैन्यनाशार्थमेकं स्वबलशान्तये ॥ १ ॥ सस्मार स्मृतिमानन्तो महोदाराधिधैर्यभृत् । अस्त्रमस्त्रेश्वरं श्रीमद्वैष्णवं शंकरोपमम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, समयोजित प्रतिभा रखनेवाले लोगों में सर्वश्रेष्ठ, महान्‌ उदार ओर अधिक धेर्यशाली राजा सिन्धु ने उस समय जब कि वह भीषण संग्राम हो रहे थे, शत्रु की सम्पूर्णं सेना के विनाशके लिए तथा अपनी सेना की पिशाचो से हुई पीडा की शान्ति के लिए सब अरत्रों के राजा असाधारण श्रीवेष्णवारत्र का, जो कालरुद्र के समान संहारकारी था, स्मरण किया

सर्ग सन्दर्भ

उनचासवाँ सर्ग समाप्त पचासवाँ सर्ग दो वैष्णवास्त्रों का युद्ध, दोनों राजाओं का रथरहित होना और राजा विदूरथ की मृत्यु का वर्णन ।