Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verses 32–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, verses 32–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 32-34
संस्कृत श्लोक
उन्मत्ताः सुविनिर्धूतास्त्यक्तहेतिरणाम्बराः ।
नार्मदा नर्मनिर्मातृ ननृतुर्जहसुर्जगुः ॥ ३२ ॥
प्रक्वणत्किंकिणीजालं शक्तिवर्षमुपागतम् ।
साल्वबाणानिलोद्भूतमगमत्पृषदाकृति ॥ ३३ ॥
शैव्यास्तु खण्डिताः कौन्तैर्भ्रमत्कुन्तैर्विघट्टिताः ।
शवीभूता दिवं नीता दृष्टा विद्याधरा इव ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
युद्ध से उन्मत्त, खूब
कँपाये गये और शस्त्रास्त्र तथा रण की पोशाक का त्याग किये हुए नर्मदातीरवासियों ने ऐसा
नृत्य, हास और गान किया, जिससे मनोविनोद होता था। समीप में आई हुई शक्तियों की
वृष्टि, जिसमें छोटी छोटी घण्टियाँ बज रही थी, साल्वदेशवासियों के बाणरूपी वायु से कम्पित
होकर बिन्दुओं के आकार में परिणत हो गई | शैव्यदेशवासी गणों को कुन्तिदेशवासी वीरगण
घुमाये जा रहे भालों से विघटित, विखण्डित और विनष्ट कर विद्याधरों के तुल्य स्वर्ग में ले
गये