Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verses 12–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, verses 12–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 12-15
संस्कृत श्लोक
उद्रवैर्भद्रगिरिभिः संग्रामाध्वरदीक्षितैः ।
क्षोणिगर्तेषु निक्षिप्ता मरगाः कमठा इव ॥ १२ ॥
प्रद्रुता विद्रवद्रक्ता विद्रावितमहारयः ।
दण्डिकास्थानिलोद्धूता हैहयैर्हरिणा इव ॥ १३ ॥
दन्तिदन्तविनिर्भिन्ना दरदा दलितारयः ।
नीता रक्तमहानद्या द्रुमाणां पल्लवा इव ॥ १४ ॥
नाराचैश्चर्विताश्चीना जीर्णा जर्जरजीविताः ।
जहुर्जलनिधौ देहान्भारभूतानिव स्थितान् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रचण्ड रणघोष करनेवाले भद्रगिरिनिवासियों ने, जो कि संग्रामरूपी यज्ञ में दीक्षित थे,
मरदेशवासी योद्धाओं को कछुओं की भाँति पृथिवी के गड्ढों में फेंक दिया । जिन्होंने पहले बड़े-
बड़े शत्रुओं को भगाया था, ऐसे दण्डिकानगरी निवासियों को, जिनके शरीरों से रुधिर बह रहा
था, हैहयवंशियों ने यों भगाया जैसे कि वायु के वेग से वातप्रेमीनामक हरिण भागते हैं । हाथियों
के दाँतों से विचूर्णित दरददेशनिवासियों को, जिन्होंने अपने शत्रुओं को विनष्ट कर दिया था,
रूधिर की महानदी पेड़ के पल्लवो की भाँति बहा ले गई । अर्धचन्द्राकार बाणो से छिन्नभिन्न
घायल अधमरे चीननिवासियों ने अपने लिए भारस्वरूप बने हुए अपने शरीरो को सागर के
अर्पण कर दिया