Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 25, Verses 2–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 25, verses 2–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 2-35
संस्कृत श्लोक
ब्रह्माण्डनरहृत्पद्मं दिगष्टकदलं बृहत् ।
गिरिकेसरसंबाधं स्वामोदभरसुन्दरम् ॥ २ ॥
सरित्केसरिकानालमध्येऽवश्यायबिन्दुकम् ।
शर्वरिभ्रमरीभ्रान्तं भूतौघमशकाकुलम् ॥ ३ ॥
अन्तर्गुणगणाकीर्णं सुरन्ध्रैः सुषिरैर्वृतम् ।
उह्यमानपयःपूरैर्दिवसालोककान्तिमत् ॥ ४ ॥
रसार्द्रं खे भ्रमद्धंसं रात्रिसंकोचभाजनम् ।
पातालपङ्कनिर्मग्ननागनाथमृणालकम् ॥ ५ ॥
कदाचिदास्पदाम्भोधिकम्पकम्पितदिग्दलम् ।
अधोनालगतानन्तदैत्यदानवकण्टकम् ॥ ६ ॥
असुरस्त्रैणवल्लर्या संभोगसुकुमारया ।
प्राप्यभूभृन्महाबीजहृदयं भूतबीजया ॥ ७ ॥
जम्बूद्वीप इति ख्यातां विपुलां तत्र कर्णिकाम् ।
सरित्केसरिकानाला नगरग्रामकेसराम् ॥ ८ ॥
कुलशैलेश्वरोत्तुङ्गबीजसप्तकसुन्दरीम् ।
मध्यस्थोच्चमहामेरुबीजाक्रान्तनभस्थलीम् ॥ ९ ॥
सरःप्रालेयकणिकां वनजङ्गलधूलिकाम् ।
स्थलेष्वामण्डलान्तस्थजनजालालिमण्डलाम् ॥ १० ॥
तां योजनशताकारैः प्रतिराकं प्रबोधिभिः ।
सागरैर्भ्रमरैर्व्याप्ता दिक्वतुष्टयशालिभिः ॥ ११ ॥
दिग्दलाष्टकविश्रान्तससुराम्भोधिषट्पदाम् ।
भ्रातृभिर्नवभिर्भूपैर्नवधा परिकल्पिताम् ॥ १२ ॥
लक्षयोजनविस्तीर्णामाकीर्णां च रजोलवैः ।
नानाजनपदव्यूहस्थिरावश्यायसीकराम् ॥ १३ ॥
द्वीपात्तु द्विगुणं मानं लवणार्णवलेखया ।
दधत्या वलितां बाह्ये प्रकोष्ठमिव कम्बुना ॥ १४ ॥
ततोऽपि द्विगुणं देहं दधत्या वलयाकृतिम् ।
जगद्भूतलताव्याप्तां शाकाख्यद्वीपलेखया ॥ १५ ॥
ततोऽपि द्विगुणाकारं धारयन्त्या च वेष्टिताम् ।
प्रत्यग्रक्षीरपूर्णाब्धिलेखया स्वादुशीतया ॥ १६ ॥
ततोऽपि द्विगुणाकारं धारयन्त्योपवेष्टिताम् ।
नानाजनालंकृतया कुशाख्यद्वीपलेखया ॥ १७ ॥
ततोऽपि द्विगुणाकारं धारयन्त्या च वेष्टिताम् ।
दध्यब्धिलेखया नित्यसंतर्पितसुरौघया ॥ १८ ॥
ततः क्रौञ्चाभिधद्वीपलेखयैवं प्रमाणया ।
वेष्टितां खातरचया नवां नृपपुरीमिव ॥ १९ ॥
ततोऽपि च घृताम्भोधिलेखयैवं प्रमाणया ।
ततोऽपि शाल्मलीद्वीपलेखया मलपूर्णया ॥ २० ॥
ततः सुरामहाम्भोधिलेखया पुष्पशुभ्रया ।
शेषस्य देहलतया हरिमूर्तिमिवावृताम् ॥ २१ ॥
ततो गोमेदकद्वीपलेखयैवप्रमाणया ।
इक्ष्वब्धिलेखयाप्येवं हिमवत्सानुशुद्धया ॥ २२ ॥
ततोऽपि पुष्करद्वीपलेखया द्विगुणस्थया ।
अन्ते स्वादूदकाम्भोधिलेखयैवं प्रमाणया ॥ २३ ॥
ततो दशगुणेनाथ पातालतलगामिना ।
निखातवलयेनोच्चैः श्वभ्रसंभाररूपिणा ॥ २४ ॥
पातालगामिमार्गेण वलितां भयदात्मना ।
एतस्मात्खलु सर्वस्मात्ततो दशगुणोच्चया ॥ २५ ॥
आव्योमसु चतुर्दिक्षु श्वभ्रसंभारभीषया ।
अर्धोन्म्लानतमोरूपलग्ननीलोत्पलस्रजा ॥ २६ ॥
नानामाणिक्यशिखरकह्लारकुमुदाब्जया ।
लोकालोकाचलोत्तालविपुलोद्दाममालया ॥ २७ ॥
वलितां त्रिजगल्लक्ष्मीधम्मिल्लवलनामिव ।
एतस्मादेव सर्वस्मात्ततो दशगुणात्मना ॥ २८ ॥
अज्ञातभूतसंचारनाम्नारण्येन मालिताम् ।
एतस्मादेव सर्वस्मात्ततो दशगुणात्मना ॥ २९ ॥
नभसेव चतुर्दिक्कं व्याप्तामतुलवारिणा ।
एतस्मादेव सर्वस्मात्ततो दशगुणात्मना ॥ ३० ॥
मेर्वादिद्रावणोत्केन ज्वालाजालेन मालिताम् ।
एतस्मादथ सर्वस्मात्ततो दशगुणात्मना ॥ ३१ ॥
मेर्वाद्यचलसङ्घातं नयता तृणपांसुवत् ।
वहताद्रीन्द्रविस्फोटकारिणा जवहारिणा ॥ ३२ ॥
निःशून्यत्वादशब्देन मरुता परितो वृतम् ।
एतस्मादथ सर्वस्मात्ततो दशगुणात्मना ॥ ३३ ॥
परितो वलितं व्योम्ना निःशून्येनैकरूपिणा ।
अथ योजनकोटीनां शतेन घनरूणिणा ।
व्याप्तं ब्रह्माण्डकुड्येन हैमेनापि द्विपर्वणा ॥ ३४ ॥
इति जलधिमहाद्रिलोकपालत्रिदशपुराम्बरभूतलैः परीतम् ।
जगदुदरमवेक्ष्य मानुषी द्राग्भुवि निजमन्दिरकोटरं ददर्श ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
दिशाएँ कम्पित हो जाती थी, नाल के अधोभाग में स्थित अनन्त दैत्य दानव ही उसके अनन्त
कटि थे, उसका मृणालकन्द सन्ततिरूपी प्राणियों की बीजभूत, संयोग से सुकुमार, असुरों के
स्त्रीसमूहरूपी मृणालकलिका आदि वल्लरी द्वारा प्राप्त करने योग्य महाबीज स्थानीय मेरु
आदि पर्वतो का हृदय के समान जीवन का हेतु था । उस भुवनरूप कमल में उन्होंने
विशालकर्णिका को देखा, जो जम्बुद्धीप नाम से प्रसिद्ध थी । उसमें सरिताएँ ही केसर की
अवान्तर शाखाओं के नालदण्ड थे, नगर ओर ग्राम ही उसमें केसर थे । वह जम्बुद्रीपरूपी
कर्णिका उत्तुंग सात कुल पर्वतरूपी बीजों से (कमलगट्टों से) बड़ी भली लगती थी । मध्यवर्ती
अत्यन्त उत्तुंग महामेरुरूपी बीज से (कमलगडे से) आकाश को स्पर्श कर रही थी, सरोवर
उसके ओस की बूँद थे । वन और जंगल उसके पराग थे तथा कर्णिका के अगल-वगल के
स्थानों मेँ चारों ओर मण्डल के मध्य में रहनेवाला जनसमुदाय ही अलिवृन्द था । वह (जम्बूद्वीप
नामक कर्णिका) प्रत्येक पूर्णिमा में उमडनेवाले, चारों दिशाओं में स्थित तथा सौ योजन
विस्तीर्ण समुद्ररूपी भ्रमरो से व्याप्त थी । आठों दिशारूपी पँखुरियों में स्थित दिक्पालों के
सहित सागर उसके षट्पद थे । उसके भद्राश्व, केतुपाल आदि नौ भाइयों ने, जो कि राजा थे,
नौ विभाग किये थे, तथा वह लाखों योजन विस्तीर्ण थी ओर रजःकणो से व्याप्त थी । अनेक
जनपद (देश) समूह उसके स्थिर हिमकण के सीकर थे । वह जम्बूद्वीपरूपी कर्णिका इस द्वीप
से (८१) दुगने परिमाणवाले क्षारसमुद्र से, शंखवलय से मणिबन्ध की नाई, चारों ओर घिरी
हुई थो । तदनन्तर उससे भी दुगुने देह को धारण कर रही शाकनामक द्वीपरेखा से घिरी हुई
जगद्रूप पद्मलता से व्याप्त थी, तदनन्तर उससे भी (शाकद्धीप से भी) दुगुने आकार धारण
करनेवाली स्वादु ओर शीतल नवीन क्षीरसे पूर्ण समुद्ररेखा से यानी क्षीरसागर से व्याप्त थी ।
तदनन्तर क्षीरसागर से भी दुगुने आकार को धारण कर रही अनेक जनों से अलंकृत कुशनामक
द्वीपरेखा से वेष्टित थी । तदनन्तर कुशद्धीप से भी दुगुने आकारवाली दधिसमुद्र की रेखा से,
जो सतत देवताओं के समूहों को तृप्त करती है, वेष्टित थी, तदनन्तर दधिसमुद्र से भी दुगुने
परिमाणवाली कौंचनामक द्विपरेखा से, नवीन राजनगरी की तरह, घिरी हुई थी । तदनन्तर
कौंचद्वीप से दुगुने आकारवाली घृतसमुद्र की रेखा से घिरी थी, तदतन्तर घृतसमुद्र से दुगुने
एवं सुरासमुद्र से परिवृत होने के कारण पापपूर्ण शाल्मलीद्रीपरेखा से वेष्टित थी । तदनन्तर
जैसे शेषनाग की देहरूपी लता से भगवान् श्रीकृष्ण की मूर्ति वेष्टित रहती है, वैसे ही पुष्प के
समान अतिशुभ्र सुरासमुद्र की रेखा से वेष्टित थी, तदनन्तर सुरासमुद्र से परिमाण में दुगुनी
गोभेदक नामक द्वीपरेखा से (मणिप्रधान प्लक्षद्रीपरेखा से) परिवेष्टित थी, तदनन्तर उससे
भी दुगुनी इश्षुसमुद्र की रेखा से जो हिमवान् के शिखर के समान शुद्ध थी, आवृत्त थी। तदनन्तर
इक्षुसागर से दुगुने परिमाणवाले पुष्करद्वीप की रेखा से घिरी हुई थी, तदनन्तर इससे भी दुगुने
८ “द्वीपाद द्विगुणम्“ इत्यादि यद्यपि पौराणिक प्रक्रिया से विरुद्ध है तथापि अन्य ब्रह्मांड को
लेकर वैसा कहा गया है यह सृष्टि को मायिक सिद्ध करने में मुख्य तात्पर्य होने के कारण वैसा कहा
गया है यह समझना चाहिए |
परिमाणवाले स्वादुजल के समुद्र से घिरी हुई थी । तदनन्तर वह कर्णिका उक्त स्वादुजलसमुद्र
से दशगुना अधिक परिमाणवाले पातालतलगामी गड्ढों के समूहरूप निखातवलय से
(निम्नदेशरूप वलय से), जो पाताल में जानेवालों का महाभयप्रद मार्ग है, वेष्टित थी । तदनन्तर
इससे भी दशगुना अधिक परिमाणवाले चारों दिशाओं में आकाशपर्यन्त गर्तो के समूह से भी
अत्यन्त भयंकर, दूसरे अर्धभाग में उन्म्लान यानी सूर्य के प्रकाश के न मिलने से ग्लानि को
अप्राप्त तथा दूसरे यानी ऊपर के अर्धभाग में सूर्य के प्रकाश के संयोग से अन्धकारके न रहने
के कारण म्लानप्राय अन्धकाररूपिणी नीलकमलों की पंक्ति से खचित था विविध प्रकार के
माणिक्यों के शिखररूपी रक्तकमल और श्वेतकमलों से युक्त लोकालोक पर्वतरूपी अतिउत्तुंग
विशाल और सौरभ्यादि गुणों से श्रेष्ठ माला से परिवेष्टित थी अतएव तीनों जगतों की लक्ष्मी
की लटकी रचना की नाई सुशोभित हो रही थी । तदनन्तर इससे भी दशगुना अधिक
परिमाणवाले अज्ञात जीवसंचार नामवाले अरण्य से वह आवृत्त थी। अनन्तर अज्ञातभूतसंचार
नामक जंगल से भी दशगुना अधिक परिमाणवाले अपरिमित जल से, आकाश के समान,
चारों दिशाओं में वह व्याप्त थी। तदनन्तर अपरिमित जल से भी दशगुना अधिक परिमाणवाले,
मेरू आदि पर्वतों को भी द्रवीभूत करने में (प्रलय करने में) समर्थ भीषण ज्वालाओं से वेष्टित
थी। तदनन्तर ज्वालाओं से भी अधिक दशगुने परिमाणवाले मेरु आदि पर्वतों के समूह को
तिनके और धूलिकण के सदुश ले जा रहे यानी अतिसामर्थ्यवान्, बड़े- बड़े पर्वतों में विस्फोट
पैदा करनेवाले, अन्य भूतों के वेग को हरनेवाले मूर्त पदार्थों से प्रतिघात न होने के कारण
शब्दरहित एवं बह रहे प्रलयकाल के वायु से चारों ओर परिवृत था। तदनन्तर पूर्वोक्त सब से
भी दशगुना बड़े केवल एक शून्यरूपी आकाश से चारों ओर घिरा था । तदनन्तर सौ करोड़
योजन परिमाणवाली खूब घनी दोहरी सुवर्णमय ब्रह्माण्ड की दीवारों से व्याप्त था । इस प्रकार
सागर, महापर्वत, लोकपाल, स्वर्ग, आकाश ओर भूतल से परिवेष्टित जगत् का मध्य देखकर
लीला ने तुरन्त पृथिवी में अपने मन्दिर का आधारभूत गिरिग्राम का अवकाश देखा