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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 25, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 25, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । नभःस्थलाद्गिरिग्रामं गच्छन्त्यौ कंचिदेव ते । ज्ञप्तिचित्तस्थितं भूमितलं ददृशतुः स्त्रियौ ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्र, आकाश-मण्डल से पर्वतग्राम को जा रहीं उन दोनों ललनाओं ने अपूर्व भूमितल को देखा, जो कि सरस्वती के मन में था यानी जिसको सरस्वती लीला को दिखलाना चाहती थी

सर्ग सन्दर्भ

चौबीसवाँ सर्ग समाप्त पचीसवाँ सर्ग सरस्वती देवी और लीला द्वारा दृष्ट सात समुद्र और सात द्वीपों से परिवेष्टि, ब्रह्माण्डरूप आवरण से युक्त अपूर्व भुवन का वर्णन ।