Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
तस्मादिमानि सकलानि विजृम्भितानि सोऽपीदमङ्ग सकलासकलं महात्मा ।
रूपावलोकनमनोमननप्रकारा कारास्पदं स्वयमुदेति विलीयते च ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
आविभाव माना जाता है वैसे ही आपके अभिमत स्रष्टा आत्मा से भिन्नतया जगत् का आविर्भाव
हुआ है ?
समाधान - नहीं, वह महान् आत्मा ही समष्टिव्यष्टिरूप बाहर इन्द्रियों द्वारा दिखाई
देनेवाला दृश्यदर्शनप्रकाराकार और अन्दर मननप्रकाराकार होकर स्वयं ही उदित होता है
ओर विलीन होता है । भाव यह कि वास्तव में उसका उदय और विनाश तो होते नहीं, पर
अज्ञानतः भ्रान्ति से उसके उदय और विनाश की प्रतीति होती है