Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verses 28–29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, verses 28–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
असदेव सदा भाति जगत्सर्वात्मकं यथा ।
श्रृण्वहं कथया राम दीर्घया कथयामि ते ॥ २८ ॥
व्यवसायकथावाक्यैर्यावत्तत्रानुवर्णितम् ।
न विश्राम्यति ते तावद्धृदि पांसुर्यथा ह्रदे ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न-प्रतीति से जयृत-प्रतीतिवैषम्य की जो श्रीरामचन्द्रजी ने आशंका की थी,
श्रीवस्रिष्ठजी उसके समाधानकी, आगे कही जानेवाली सृष्टी की आख्यायिका से, प्रतिज्ञा
करते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : यह जगत् ब्रह्यात्मक ही है, उससे अतिरिक्त नहीं है । जगत्रूप से
असत् होता हुआ भी जिस प्रकार सत्-प्रतीत होता है, उसको मैं आपसे बड़ी लम्बी
(मण्डपोपाख्यान आदि से बढ़ाई गई) आख्यायिका से कहता हूँ, आप सुनिये आशय यह कि
यद्यपि इस जगत्की प्रतीति बड़ी दृढ़ है, तथापि यह असत् होता ही सद्रूप से प्रतीत होता है,
इस अंशमें इसकी स्वप्न से समता है ही । रह गई दृढ प्रतीति की बात, सो तो चिरकाल से
बद्धमूल होने के कारण है । तब तक सुनिये, जब तक कि पूर्वजों के व्यवहार के प्रतिपादक
वाक्यों से उन लम्बी आख्यायिकाओं में वर्णित तत्व आपके हृदय में, तालाब में धूलि के
समान, न बैठ जाय