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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 8, Verses 18–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 8, verses 18–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 18-21

संस्कृत श्लोक

कालविद्भिर्विनिर्णीता यस्यातिचिरजीविता । स चेज्जीवति संछिन्नशिरास्तद्दैवमुत्तमम् ॥ १८ ॥ कालविद्भिर्विनिर्णीतं पाण्डित्यं यस्य राघव । अनध्यापित एवासौ तज्ज्ञश्चेद्दैवमुत्तमम् ॥ १९ ॥ विश्वामित्रेण मुनिना दैवमुत्सृज्य दूरतः । पौरुषेणैव संप्राप्तं ब्राह्मण्यं राम नान्यथा ॥ २० ॥ अस्माभिरपरै राम पुरुषैर्मुनितां गतैः । पौरुषेणैव संप्राप्ता चिरं गगनगामिता ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कहिए ज्योतिषी जो ग्रहों का वर्णन करते है, वही दैव है, सो ठीक नहीं, क्योकि ग्रह तो अपनी गतिविशेष से पौरुष और उसके फल का सूचन ही करते हैं, फल के कारण नहीं है, इस अभिप्राय से कहते है । ज्योतिषियों द्वारा जिसकी बहुत बड़ी आयु का निर्णय किया गया है, यदि वह सिर कटने पर भी जीवित रहे, तो दैव उत्तम कारण हो । हे रामचन्द्रजी, ज्योतिषियों ने जिसके विषय में यह बड़ा भारी विद्वान होगा ऐसा निर्णय किया है, वह यदि बिना पढाये ही विद्धान्‌ हो जाय, तब दैव को उत्तम कारण कहना चाहिए । हे राम, देखो, इन महामुनि श्रीविश्वामित्रजी ने देव को दूर फेंककर पौरुष के अवलम्बन से ही ब्राह्मणत्व प्राप्त किया, अन्य उपाय से नहीं । हम लोगों ने एवं अन्यान्य और लोगों ने जो कि मुनि बने हैं, चिरकाल के प्रयत्न से ही आकाशगति प्राप्त की हे