Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 7, Verses 30–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 7, verses 30–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 30-32
संस्कृत श्लोक
आबाल्यादलमभ्यस्तैः शास्त्रसत्संगमादिभिः ।
गुणैः पुरुषयत्नेन स्वार्थः संपद्यते हितः ॥ ३० ॥
पौरुषेण जिता दैत्याः स्थापिता भुवनक्रियाः ।
रचितानि जगन्तीह विष्णुना न च दैवतः ॥ ३१ ॥
जगति पुरुषकारकारणेऽस्मिन् कुरु रघुनाथ चिरं तथा प्रयत्नम् ।
व्रजसि तरुसरीसृपाभिधानां सुभग यथा न दशामशङ्क एव ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राप्त की, पौरुष से ही लोकों कि क्रियाएँ नियत की ओर पौरुष से ही लोकों की रचना की, दैव
से नहीं । हे रघुनन्दन, इस जगत् में केवल पुरुषप्रयत्न ही पुरुषार्थ का हेतु है। यहाँ आप
चिरकाल तक वैसा पौरुष कीजिये जैसे कि हे सौम्य, आप वृक्ष, सर्प आदि योनियों को प्राप्त
न हों