Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 7, Verses 1–29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 7, verses 1–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 1-29
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
प्राप्य व्याधिविनिर्मुक्तं देहमल्पाधिवेदनम् ।
तथात्मनि समादध्याद्यथा भूयो न जायते ॥ १ ॥
दैवं पुरुषकारेण यो निवर्तितुमिच्छति ।
इह वामुत्र जगति स संपूर्णाभिवाञ्छितः ॥ २ ॥
ये समुद्योगमुत्सृज्य स्थिता दैवपरायणाः ।
ते धर्ममर्थं कामं च नाशयन्त्यात्मविद्विषः ॥ ३ ॥
संवित्स्पन्दो मनःस्पन्द ऐन्द्रियस्पन्द एव च ।
एतानि पुरुषार्थस्य रूपाण्येभ्यः फलोदयः ॥ ४ ॥
यथा संवेदनं चेतस्तथा तत्स्पन्दमृच्छति ।
तथैव कायश्चलति तथैव फलभोक्तृता ॥ ५ ॥
आबालमेतत्संसिद्धं यत्र यत्र यथा यथा ।
दैवं तु न क्वचिद्दृष्टमतो जगति पौरुषम् ॥ ६ ॥
पुरुषार्थेन देवानां गुरुरेव बृहस्पतिः ।
शुक्रो दैत्येन्द्रगुरुतां पुरुषार्थेन चास्थितः ॥ ७ ॥
दैन्यदारिद्र्यदुःखार्ता अपि साधो नरोत्तमाः ।
पौरुषेणैव यत्नेन याता देवेन्द्रतुल्यताम् ॥ ८ ॥
महान्तो विभवास्वादैर्नानाश्चर्यसमाश्रयाः ।
पौरुषेणैव दोषेण नरकातिथितां गताः ॥ ९ ॥
भावाभावसहस्रेषु दशासु विविधासु च ।
स्वपौरुषवशादेव निवृत्ता भूतजातयः ॥ १० ॥
शास्त्रतो गुरुतश्चैव स्वतश्चेति त्रिसिद्धयः ।
सर्वत्र पुरुषार्थस्य न दैवस्य कदाचन ॥ ११ ॥
अशुभेषु समाविष्टं शुभेष्वेवावतारयेत् ।
प्रयत्नाच्चित्तमित्येष सर्वशास्त्रार्थसंग्रहः ॥ १२ ॥
यच्छ्रेयो यदतुच्छं च यदपायविवर्जितम् ।
तत्तदाचर यत्नेन पुत्रेति गुरवः स्थिताः ॥ १३ ॥
यथा यथा प्रयत्नो मे फलमाशु तथा तथा ।
इत्यहं पौरुषादेव फलभाङ् न तु दैवतः ॥ १४ ॥
पौरुषाद्दृश्यते सिद्धिः पौरुषाद्धीमतां क्रमः ।
दैवमाश्वासनामात्रं दुःखे पेलवबुद्धिषु ॥ १५ ॥
प्रत्यक्षप्रमुखैर्नित्यं प्रमाणैः पौरुषक्रमः ।
फलितो दृश्यते लोके देशान्तरगमादिकः ॥ १६ ॥
भोक्ता तृप्यति नाभोक्ता गन्ता गच्छति नागतिः ।
वक्ता वक्ति न चावक्ता पौरुषं सफलं नृणाम् ॥ १७ ॥
पौरुषेण दुरन्तेभ्यः संकटेभ्यः सुबुद्धयः ।
समुत्तरन्त्ययत्नेन न तु मोघतयानया ॥ १८ ॥
यो यो यथा प्रयतते स स तत्तत्फलैकभाक् ।
न तु तूष्णीं स्थितेनेह केनचित्प्राप्यते फलम् ॥ १९ ॥
शुभेन पुरुषार्थेन शुभमासाद्यते फलम् ।
अशुभेनाशुभं राम यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २० ॥
पुरुषार्थात्फलप्राप्तिर्देशकालवशादिह ।
प्राप्ता चिरेण शीघ्रं वा यासौ दैवमिति स्मृता ॥ २१ ॥
न दैवं दृश्यते दृष्ट्या न च लोकान्तरे स्थितम् ।
उक्तं दैवाभिधानेन स्वर्लोके कर्मणः फलम् ॥ २२ ॥
पुरुषो जायते लोके वर्धते जीर्यते पुनः ।
न तत्र दृश्यते दैवं जरायौवनबाल्यवत् ॥ २३ ॥
अर्थप्रापककार्यैकप्रयत्नपरता बुधैः ।
प्रोक्ता पौरुषशब्देन सर्वमासाद्यतेऽनया ॥ २४ ॥
देशाद्देशान्तरप्राप्तिर्हस्तस्य द्रव्यधारणम् ।
व्यापारश्च तथाङ्गानां पौरुषेण न दैवतः ॥ २५ ॥
अनर्थप्राप्तिकार्यैकप्रयत्नपरता तु या ।
प्रोक्ता प्रोन्मत्तचेष्टेति न किंचित्प्राप्यतेऽनया ॥ २६ ॥
क्रियया स्पन्दधर्मिण्या स्वार्थसाधकता स्वयम् ।
साधुसंगमसच्छास्त्रतीक्ष्णयोन्नीयते धिया ॥ २७ ॥
अनन्तसमतानन्दं परमार्थं स्वकं विदुः ।
स येभ्यः प्राप्यते यत्नात्सेव्यास्ते शास्त्रसाधवः ॥ २८ ॥
सच्छास्त्रादिगुणो मत्या सच्छास्त्रादिगुणान्मतिः ।
विवर्धेते मिथोऽभ्यासात्सरोजाविव कालतः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
छठा सर्म समाप्त
सातवाँ सर्ग
प्रचुर उदाहरण ओर प्रत्युदाहरणों तथा युक्तियोँ से पौरुष की प्रधानता का समर्थन ।
दैव का निराकरण कर पहले जो पौरूषप्रधानता का समर्थन किया गया था, उसीको
उदाहरण ओर प्रत्युदाहरण द्वारा दृढ़ करनेवाले श्रीवसिष्ठजी उपपत्तिपूर्वक हितोपदेशद्रारा
अधिकारियों को पुरुषार्थ की ओर आकृष्ट करते हैँ ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, रोगरहित, स्वल्प मानसिक पीड़ा से युक्त देह को
प्राप्त कर आत्मा में इस प्रकार चित्त की एकाग्रता करे किं जिससे फिर जन्म ही न हो। जो
पुरुष पौरुष से दैव को जीतने की इच्छा करता हे, उसके इस लोक मेँ ओर परलोक में
सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण हो जाते हँ । जो लोग उद्यम का परित्याग कर देव पर निर्भर रहते हैं,
वे आत्मशत्रु अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष का विनाश करते हँ । पुरुषार्थ ओर उसके साधनों
की स्फूर्ति संवित्स्पन्द है उससे उनके साधन की इच्छा से जन्य प्रयत्न मनःस्पन्द है अर्थात्
दृढसंकल्प, उससे कर्मेन्द्रियं ओर अंगों के संचालन की प्रवृत्ति इन्द्रियस्पन्द है अर्थात्
कार्यप्रवृत्ति या अनुष्ठान में रत होना । बुद्धि, मन और कर्मेन्द्रियोकी उक्त चेष्टाएँ पौरुष के
रूप हैं उक्त पुरुषप्रयत्नों से ही संकल्पित फल की प्राप्ति होती हे । साक्षी चेतन में पहले
जैसी विषयाभिव्यक्ति (विषय ज्ञान) होती है, वैसी ही मन में क्रिया होती है, मन के व्यापार
के अनुसार कर्मेन्द्रियों में व्यापार होता हे, कर्मेन्द्रियों के व्यापार के अनुरूप शारीरिक क्रिया
के अनुसार ही फल की सिद्धि होती है । लोक मेँ लौकिक या वैदिक फल के लिए जहाँ जैसे
जैसे पुरुषप्रयत्न की आवश्यकता होती है वहाँ वैसे ही पुरुषप्रयत्न के उपयोग से फल की
सिद्धि होती है यह बात बच्चों तक को विदित है । जैसे ध्यान आदि में मानसिक प्रयत्न ही
प्रधान है, आसन तथा मौन उसके अंग हैं, स्तुति करने में वाचिक प्रयत्न प्रधान हैं, एकाग्रता
ओर ध्येय देवता की अभिमुखता उसके अंग हैं, यात्रा आदि में कायिक प्रयत्न ही प्रधान है,
वाणी ओर मन का नियन्त्रण उसके अंग हैं । कहीं पर दो दो प्रयत्न प्रधान रहते हैं, कहीं
पर तीन प्रयत्न प्रधान रहते हैँ, इस प्रकार सब जगह पौरुष ही देखा जाता है, दैव तो कहीं
देखा नहीं गया, इसलिए वह असत् है । हे श्रीरामजी, पुरुषप्रयत्न से ही बृहस्पति देवताओं
के गुरु बने ओर पुरुषार्थ से ही शुक्राचार्यने दैत्यराजो का गुरुत्वपद प्राप्त किया था ।
दीनता, दरिद्रता आदि दुःखों से पीडित हुए भी अनेक महापुरुष अपने पौरुष से (प्रयत्न
से) ही महेन्द्र के सदुश रेश्वर्यशाली हो गये हैं । हरिश्चन्द्र, नल, युधिष्ठिर आदि का
इतिहास इस बात का साक्षी है । महासम्पत्तियों का उपभोग करनेवाले तथा उन विपुल
वैभवों के अधिपति जिनका कि स्मरण करने में आश्चर्य होता हे, नहुष आदि महापुरूष
अपनेही पौरुषदोष से नरकगामी हुए, उत्कट पद से भ्रष्ट हुए । सभी प्राणी हजारों सम्पत्तियां
ओर विपत्तियं को और विविध दशाओं को अपने भले बुरे पुरुषप्रयत्न से ही पार करते हैँ ।
हे रामचन्द्रजी, शास्त्राभ्यास, गुरुउपदेश और अपना परिश्रम इन तीनों से ही पुरुषार्थ की
सिद्धि देखी जाती है, लौकिक पुरुषार्थ अपने परिश्रम से ही सिद्ध होते है, यज्ञ, याग आदि
अपने परिश्रम और शास्त्र की सहायता से सिद्ध होते हैं और ज्ञान अपने परिश्रम, शास्त्र की
सहायता तथा गुरु के उपदेश से सिद्ध होता है, इस प्रकार की तीन सिद्धिर्यो पुरुषार्थ से
ही देखी जाती हैं, दैव से सिद्धियाँ कभी नहीं देखी गई । अपना अभ्युदय चाहनेवाला पुरूष
अशुभ कर्मों में संलग्न मन को प्रयत्न से शुभ कर्मो मेँ लगाये, यह सम्पूर्ण शास्त्रों के सारांश
का संग्रह है । वत्स, जो वस्तु कल्याणकारी है, तुच्छ नहीं है (सर्वोत्कृष्ट है), जो विनाश
रहित (अविनाशी) है, उसीका प्रयत्न से सम्पादन करो, ऐसा उपदेश गुरुजन सदा देते है ।
जैसे-जैसे मैं प्रयत्न करूँगा, वैसे वैसे ही मुझे शीघ्र फल प्राप्त होगा, ऐसा निश्चय करके
मेँ प्रयत्न से शुभ फल का भाजन हुआ हूँ, दैव से मेरा कुछ भी उपकार नहीं हुआ | पौरुष
से पुरुषों को अभीष्ट पदार्थ प्राप्त होते हँ ओर पौरुष से बुद्धिमान् जनों के पराक्रम की वृद्धि
होती है । दैव तो दुःखसागर में डूबे हुए दुर्बलचित्तवाले लोगों के आँसू पोंछना मात्र है और
कुछ नहीं है, भाव यह कि दुःखी लोगों को समझाने बुझाने और ढ़ाढ़स बाँधने के लिए लोग
देव-देव पुकारते हैं । लोक में प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से पुरुषप्रयत्न का फल अन्य देश में
गमन आदि सब लोगों को सदा दिखाई देता है । यदि पुरुष पौरुष का अवलम्बन नहीं करे,
तो उसका अन्य देश में गमन कैसे हो सकता है ? जो पुरुष भोजन करता है वही तृप्त होता
है, जो भोजन नहीं करता वह कभी भी तृप्त नहीं हो सकता, जो चलता है वही अन्य देश
में पहुँचता है, गसन न करनेवालों की कदापि अन्य देशमें गति नहीं हो सकती, जो वक्ता
है, वही बोल सकता है, जो अवक्ता है वह क्या बोलेगा ? इससे सिद्ध है कि पुरुषों का
पुरुषप्रयत्न ही सफल है, दैव नहीं । पौरुष से ही बुद्धिमान् पुरुष बड़े भीषण संकटों को बात
ही बात में पार कर जाते हैं, न कि पौरुषरहित (अकर्मण्यतारूप) दैव पर निर्भर होकर ।
जो पुरुष जैसा-जैसा प्रयत्न करता है, उसे वैसा-वैसा फल प्राप्त होता है, इस लोक में
जो हाथ पर हाथ रखकर चुपचाप बैठा रहता है, उसे तनिक भी फल नहीं मिल सकता।
हे राम, शुभ पुरुषार्थ से (पौरुष से) शुभ फल मिलता है और अशुभ पुरुषार्थ से अशुभ फल
मिलता है, तुम्हें जैसे फल की अभिलाषा हो वैसे पुरुषार्थ का अवलम्बन कर उस फल के
भागी बनो । पुरुषार्थी पुरुषों को देश और काल के अनुसार पुरुषप्रयत्न से कभी शीघ्र और
कभी कुछ विलम्ब से जिस फल की प्राप्ति होती है, उसी को अज्ञानी उद्यमहीन व्यक्ति
*दैव” कहते हैं। न तो 'दैव” का नयनों से दर्शन होता है, न वह कहीं स्वर्ग आदि अन्य लोक
में ही स्थित है। पुरुषार्थी का स्वर्गलोक में स्थित कर्मफल ही दैवनाम से पुकारा जाता है।
इस लोक में पुरूष पैदा होता है, बढ़ता है, फिर वृद्ध होता है, पर उस पुरूष में जैसे
वृद्धास्था, यौवन और बाल्यावस्था दिखाई देती है, वैसे दैव नहीं दिखाई देता । अपने
अभीष्ट को प्राप्त करानेवाली कार्यमात्रतत्परता को विद्वान लोग पौरुष कहते हैं, उसीसे सब
कुछ प्राप्त किया जाता है । एक स्थान से दूसरे स्थान की प्राप्ति पैरों के पुरुषार्थ से होती
है, हाथ का किसी वस्तु को पकड़ना हाथ के पौरुष से होता है और इसी प्रकार अन्यान्य
अंगों के अन्यान्य व्यापार (चेष्टाएँ) पौरुष से ही होते हँ, दैव से नहीं । अनभीष्ट पदार्थ की
प्राप्ति करानेवाले कार्य में जो संलग्नता है, वह उन्मत्त की चेष्टा हे, उससे कोई भी शुभ
फल प्राप्त नहीं होता, अशुभ (नरकपात आदि) फल ही प्राप्त होता है । देहचालनपरम्परारूप
गुरुसेवा ओर श्रवण आदि क्रिया से तथा सज्जनसंगति और शास्त्रपरिशीलन आदि से
तीक्ष्ण हुई बुद्धि से जो स्वयं अपनी आत्मा का उद्धार किया जाता है, वही स्वार्थसाधकता
हे । अज्ञानकृत विषमता की निवृत्ति से उपलक्षित अनन्त आनन्दरूप अपने परमार्थ को जो
जानते हैं और जिनसे उक्त आनन्द प्राप्त किया जाता है, उन शास्त्र और महात्माओं की
प्रणिपातपूर्वक सेवा करनी चाहिए । बार-बार सज्जनसंगति का फल उनके तुल्य शील-
स्वभाव की प्राप्ति है और शास््राभ्यास का फल शास्त्र तात्पर्यज्ञान है । बुद्धि से सत्
शास्त्राभ्यासरूप गुण होता ओर सत् शास्त्र के अभ्यास आदि से बुद्धि की वृद्धि होती हे ।
जैसे वर्षाकाल में तालाब और कमल परस्पर की शोभा बढ़ाते है, वैसे ही चिरकाल के
अभ्यास से मति ओर मति से शास्त्राभ्यास की वृद्धि होती हे । भाव यह कि मनुष्य जैसे जैसे
गुरुसेवा और शास्त्राभ्यास में तत्पर होता है वैसे वैसे उसका बोध बढ़ता हे ओर जैसे-जैसे
बोध की अभिवृद्धि होती है वैसे वैसे गुरू और शास्त्र में विश्वास बढ़ता है । उनकी वृद्धि होने
पर सुख की वृद्धि होती है, तदनन्तर उत्तरोत्तर भूमिका मेँ आरूढ होता हे