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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

अनर्थः प्राप्यते यत्र शास्त्रितादपि पौरुषात् । अनर्थकर्तृ बलवत्तत्र ज्ञेयं स्वपौरुषम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

शास्त्रीय मार्गमे यत्न कर रहे लोगों को भी कभी कभी रोगादि अनर्थ कर्यो प्राप्त होते हैं ? ऐसी आशंका होने पर कहते हैं । जहाँ पर शास्त्रानुमोदित पौरुष से भी विघ्नबाधा प्राप्त होती है, वहाँ पर अनर्थकारी अपने पौरुष को बलवान्‌ समझना चाहिए