Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, Verses 23–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
पौरुषं च नवानन्तं न यत्नमभिवाच्छ्यते ।
न यत्नेनापि महता प्राप्यते रत्नमश्मतः ॥ २३ ॥
यथा घटः परिमितो यथा परिमितः पटः ।
नियतः परिमाणस्थः पुरुषार्थस्तथैव च ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
एव“ पद योग्य जन्म का लाभ होने पर भी पुरुषार्थ की सिद्धि न करने पर फिर पुरुषार्थ
सिद्धि की दुर्लभता का द्योतक हे । श्रुति भी है- इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती
विनष्टिः ˆ अथात् यदि अधिकारी मनुष्य ने आत्मतत्व को जान लिया, तो मनुष्यजन्म की ठीक
सार्थकता है, यदि आत्मतत्व को नहीं जाना, तो बड़ा भारी विनाश है-अविच्छिन्न जन्म,
मरण, नरक आदि की परम्परा प्राप्त होती है।
इतने समय तक पुरुषार्थ करना चाहिए, इस प्रकार अवधिका ज्ञान न होने के कारण वह
अनन्त है और उसमें अति परिश्रम भी है, अतः उसमें कैसे प्रवृत्ति हो ? इस पर कहते है ।
पौरुष निरवधिक नहीं हे, साक्षात्कार का उदय ही उसकी अवधि है । वह प्रयत्न की भी
अपेक्षा नहीं करता