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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

तत्रातिपरिणामेन तदेव घनतां गतम् । इहलोकोऽयमित्येव जीवाकाशे विजृम्भते ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी परिस्थिति में भगवान्‌ वेदव्यासजी का वैधम्यच्चि न स्वप्नादिवत्‌ (जाग्रत्‌ और स्वप्न आदि में अबाधितविषयत्व और बाधितविषयत्वरूप विलक्षणता है, अतएव जाग्रत-ज्ञान स्वप्नादिज्ञान के समान निर्विषय नहीं है) यह सूत्र कैसे संगत होगा एवं भोक्ता के जाग्रतकाल में स्वप्न से विपरीत जो चिरकाल तक नियत व्यवहार आदि होते हैं और जो उनमें सत्यता प्रतीत होती है, उसकी क्या गति होगी ? उस पर कहते है । जीव ने जीवनावस्था में जो जगत्‌ देखा था, मृत्यु के अनन्तर उसीका उसको स्मरण होता है ओर फिर जन्म होने पर उसीका वह अनुभव करता है । जगत्‌ यद्यपि पूर्वोक्त प्रकार से असत्‌ है, फिर भी अति परिचय से दृढता को प्राप्त होकर जीवाकाश में प्रकाशित होता है