Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
एवं मृता म्रियन्ते च मरिष्यन्ति च कोटयः ।
भूतानां यां जगन्त्याशामुदितानि पृथक्पृथक् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
शकरा - तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति चक्षुप्रो वा मूर्ध्नो वाऽन्येभ्यो वा
शरीरदेशेभ्यस्तमुत्करामन्तं प्राणोऽनूत्रामति।
(उस हृदय के अग्रभाग के प्रकाशन के साथ निकलता हुआ आत्मा चक्षु से या मस्तक से
अथवा अन्यान्य शरीर-प्रदेशों से निकलता है, उसके निकलने पर प्राण भी उसका अनुसरण
करता है) ओर “उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि“ (निकल रहे या स्थित) इत्यादि अनेक श्रुति ओर
स्मृतियों के विरूद्ध मृत का अपने हृदय में ही परलोकदर्शन कैसे कहते हैं ?
समाधान - कर्म और उपासना से होनेवाले भावी व्यवहारदष्टि से वे श्रुतियाँ और स्मृतियाँ
हैं अर्थात् कर्म और उपासना से होनेवाले भावी फल के अनुसार बाहर निकलने के मार्ग अनेक
प्रकार के हैं, यह दशनि के लिए उक्त श्रुति और स्मृतियाँ हैं- जिसे सूर्यलोक में जाना होता है
वह चक्षुसे, जिसे ब्रह्मलोक में जाना होता है वह ब्रह्मरन्ध्र से और जिसे अन्यान्य स्थानों में
जाना होता है वह अन्यान्य शरीर के अवयवों से निष्क्रान्त होता है। यहाँ पर तो परमार्थद्रष्टि
से अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते“ (इस हृदयाकाश में यौ ओर पृथिवी भती- भाँति
स्थित हैं) इस श्रुतिवाद के समान हृदय में ही परलोककी कल्पना की जाती है । आत्मा के
व्यापक होने से उसका आवास हृदय भी अपरिच्छिन्न हआ, अतः हृदय-साक्षीमें हृदयरूप
परिच्छेद को दूरकर निष्क्रियत्व और प्रपंचमें केवल वासनामयत्व का ज्ञान कराने के लिए,
परलोकके समान उत्रमण और गमन की भी वहीं पर (हृदय में ही) कल्पनामात्र से उपपत्ति हो
सकती है, अतः उक्त श्रुति और स्मृति से कोई विरोध नहीं है ।
एक स्थान में दश गई युक्ति को सर्वत्र दशति हैं।
इसी प्रकार करोड़ों प्राणी मर चुके हैं, मरते हैं और मरेंगे, वे मृत्यु के पहले जीवन-दशा में
जिस सम्पूर्ण जगत्का दर्शन करते हैं-दृश्यसमूह देखते हैं-उनमें से जिस दृश्य में उनकी
वासना (संस्कार) जड़ पकड़ लेती है, मृत्युकाल में उनके हृदयाकाश में वही दृश्य उदित होता
है, मरण के अनन्तर उन्हें वही दृश्य-जगत् (योनि) प्राप्त होता है (=) । सारांश यह कि यह
सम्पूर्ण जगत् वासनाविशेष के विलाससे अतिरिक्त कुछ नहीं है