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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verses 42–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, verses 42–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 42-45

संस्कृत श्लोक

अनुशिष्टः स इत्येवं जनकेन महात्मना । अतिष्ठत्स शुकस्तूष्णीं स्वच्छे परमवस्तुनि ॥ ४२ ॥ वीतशोकभयायासो निरीहश्छिन्नसंशयः । जगाम शिखरं मेरोः समाध्यर्थमनिन्दितम् ॥ ४३ ॥ तत्र वर्षसहस्राणि निर्विकल्पसमाधिना । दश स्थित्वा शशामासावात्मन्यस्नेहदीपवत् ॥ ४४ ॥ व्यपगतकलनाकलङ्कशुद्धः स्वयममलात्मनि पावने पदेऽसौ । सलिलकण इवाम्बुधौ महात्मा विगलितवासनमेकतां जगाम ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञान का विनाश होने से परम शुद्ध अतएव संचित और आगामी पुण्य ओर पाप के असंपर्क एवं विनाश से निर्मलस्वरूप और प्रारब्ध कर्मो का नाश होने के कारण अशुद्ध देह आदि की निवृत्ति होने से पावन हुए महात्मा श्रीशुकदेवजी निर्मल परमपावन परमात्मवस्तु में वासनारहित होकर जैसे जलबिन्दु समुद्र में मिल जाता है वैसे ही एकता को प्राप्त हो गये अर्थात्‌ भेदक उपाधि के नष्ट होने पर वास्तव अखण्डेक्य को प्राप्त हो गये