Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verses 30–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, verses 30–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 30-33
संस्कृत श्लोक
विश्वामित्र उवाच ।
जनकेनेति पृष्टेन शुकस्य कथितं तदा ।
तदेव यत्पुरा प्रोक्तं तस्य पित्रा महात्मना ॥ ३० ॥
श्रीशुक उवाच ।
स्वयमेव मया पूर्वमेतज्ज्ञातं विवेकतः ।
एतदेव च पृष्टेन पित्रा मे समुदाहृतम् ॥ ३१ ॥
भवताप्येष एवार्थः कथितो वाग्विदां वर ।
एष एव च वाक्यार्थः शास्त्रेषु परिदृश्यते ॥ ३२ ॥
यथायं स्वविकल्पोत्थः स्वविकल्पपरिक्षयात् ।
क्षीयते दग्धसंसारो निःसार इति निश्चयः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीविश्वामित्रजी ने कहा : यों पूछने पर
जनक ने श्रीशुकदेवजी से उसी तत्त्व का उपदेश दिया जिसका कि पहले उनके पिता महात्मा
श्रीवेदव्यासजी ने दिया था । श्रीशुकदेवजी ने कहा : मैंने यह बात अपने विवेक से पहले ही जान ली थी
ओर जव मेने अपने पिताजी से पूछा, तो उन्होने भी यही कहा । हे वक्ताओं मे श्रेष्ठ महाराज, आपने भी
यही बात कही । सम्पूर्णं उपनिषदों में स्थित महावाक्यं का भी यही अखण्ड वाक्यार्थ उपनिषद् के
तात्पर्य का निर्णय करनेवाले सूत्र, भाष्य आदि शास्त्रों में दिखाई देता है वह यह कि-यह निन्दित
संसार अन्तःकरण से उत्पन्न हुआ है ओर अन्तःकरण का आत्यन्तिक विनाश होने से नष्ट हो जाता है,
अतः यह निस्सार है; ऐसा तत्त्वज्ञानियों का निश्चय हे ([्)