Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
वाल्मीकिरुवाच ।
इति नादेन महता वचस्युक्ते सभागतैः ।
राममग्रगतं प्रीत्या विश्वामित्रोऽभ्यभाषत ॥ १ ॥
न राघव तवास्त्यन्यज्ज्ञेयं ज्ञानवतां वर ।
स्वयैव सूक्ष्मया बुद्ध्या सर्वं विज्ञातवानसि ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण
पहला सर्ग
विचार द्वारा स्वयं ज्ञात और पिता द्वारा उपदिष्ट तत्त्वज्ञान में विश्वास न कर रहे
श्रीशुकदेवजी को जनक के उपदेश से विश्रान्तिप्राप्ति का वर्णन |
श्रीरामचन्द्रजी ने जिस शम, दम आदि साधनसम्पत्तिका वर्णन किया है, वह किस प्रकार से व्यवहार
कर रहे मुमुक्षुओं को प्राप्त होती है और उससे किस प्रकार तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होती है, इस प्रकार
प्रत्येक का विवेचन कर उनके उपदेश के लिए दूसरे मुमुक्ष॒व्यवहारप्रकरण का आरम्भ करते हुए
श्रीवाल्मीकिजी बोले : इस प्रकरण में सर्वप्रथम, जिन्हें थोड़ा बहुत (अपरिपक्व) वैराग्य आदि साधन
प्राप्त है, उनकी अधिकार सम्पत्ति हमें प्राप्त हो गई, इस भ्रान्ति से सहसा श्रवण आदि में प्रवृत्ति न हो,
यह दशनि के लिए श्री शुकदेवजी की आख्यायिका द्वारा साधन सम्पत्ति की दढता का स्वरूप दर्शा रहे
“आचायदिव विद्या विदिता साधिष्ठं पापत्” (आचार्य से ही ज्ञात विद्या श्रेष्ठतम होती है) इस श्रुति के
अनुसार कुलगुरु श्रीवस्निष्ठजी को, श्रीरामचन्द्रजी को उपदेश देने के लिए, इतिहासस्मरण और
तत्त्वोपदेश की भूमिका द्वारा उत्साहित कर रहे एवं स्वप्रयोजनसिद्धिरूप श्रवण के लिए शीघ्रता कर रहे
श्रीविश्वामित्र ही पहले बोले, ऐसा कहते हैं।
सभा में आये हुए रिद्धों द्वारा बड़ दीर्घं स्वर से पूर्वोक्त वचन कहने पर अपने सामने स्थित एवं
अधिकार की सीमा में स्थित श्रीरामचन्द्रजी से श्रीविश्वामित्रजी प्रीतिपूर्वक (& ) बोले : हे ज्ञानियों में
सर्वश्रेष्ठ रामचन्द्र, तुम्हारे लिए ओर ज्ञातव्य कुछ भी नहीं है, अर्थात् जो तुम्हें ज्ञात हो ओर अवश्य
ज्ञातव्य हो, ऐसी कोई वस्तु नहीं है। तुम सार और असार का विवेचन करने में अति दक्ष अपनी बुद्धि से
सम्पूर्ण हेयोपादेयरहस्य को जान चुके हो अर्थात् उक्त बुद्धि से तुम्हें परमार्थसारभूत अखण्ड अद्वितीय
चिद्घन परमात्मतत्त्व भी ज्ञात हो गया है