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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 4, Verses 7–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 4, verses 7–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 7-9

संस्कृत श्लोक

प्रातरुत्थाय रामोऽसौ कृत्वा संध्यां यथाविधि । सभासंस्थं ददर्शेन्द्रसमं स्वपितरं तथा ॥ ७ ॥ कथाभिः सुविचित्राभिः स वसिष्ठादिभिः सह । स्थित्वा दिनचतुर्भागं ज्ञानगर्भाभिरादृतः ॥ ८ ॥ जगाम पित्रानुज्ञातो महत्या सेनयावृतः । वराहमहिषाकीर्णं वनमाखेटकेच्छया ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी नित्य प्रातःकाल शय्या का त्याग कर, विधिपूर्वक स्नान, सन्ध्या आदि कर्म करके सभा में बैठे हुए इन्द्रतुल्य अपने पिताजी का दर्शन करते थे ओर एक पहर तक श्रीवसिष्ठ आदि के साथ बैठकर ज्ञानपूर्ण विविध विचित्र कथाओं द्वारा बड़े आदर के साथ सत्संग कर तदनन्तर शिकार खेलने की इच्छा से, पिताजी की आज्ञा लेकर, बडी भारी सेना के साथ वनवराह, वनमहिष आदि से भरे हुए वन में जाते थे