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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 32, Verses 12–27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 32, verses 12–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 12-27

संस्कृत श्लोक

अथ तूष्णीं स्थितवति रामे राजीवलोचने । तस्मिन्रघुकुलाकाशशशाङ्के शशिसुन्दरे ॥ १२ ॥ साधुवादगिरा सार्धं सिद्धसार्थसमीरिता । वितानकसमा व्योम्नः पौष्पी वृष्टिः पपात ह ॥ १३ ॥ मन्दारकोशविश्रान्तभ्रमरद्वन्द्वनादिनी । मधुरामोदसौन्दर्यमुदितोन्मदमानवा ॥ १४ ॥ व्योमवातविनुन्नेव तारकाणां परम्परा । पतितेव धरापीठे स्वर्गस्त्रीहसितच्छटा ॥ १५ ॥ वृष्यमूककचन्मेघलवावलिरिव च्युता । हैयंगवीनपिण्डानामीरितेव परम्परा ॥ १६ ॥ हिमवृष्टिरिवोदारा मुक्ताहारचयोपमा । ऐन्दवी रश्मिमालेव क्षीरोर्मीणामिवाततिः ॥ १७ ॥ किञ्जल्काम्भोजवलिता भ्रमद्भृङ्गकदम्बका । सीत्कारगायदामोदिमधुरानिललोलिता ॥ १८ ॥ प्रभ्रमत्केतकीव्यूहा प्रस्फुरत्कैरवोत्करा । प्रपतत्कुन्दवलया चलत्कुवलयालया ॥ १९ ॥ आपूरिताङ्गणरसा गृहाच्छादनचत्वरा । उद्ग्रीवपुरवास्तव्यनरनारीविलोकिता ॥ २० ॥ निरभ्रोत्पलसंकाशव्योमवृष्टिरनाकुला । अदृष्टपूर्वा सर्वस्य जनस्य जनितस्मया ॥ २१ ॥ अदृश्याम्बरसिद्धौघकरोत्करसमीरिता । सा मुहूर्तचतुर्भागं पुष्पवृष्टिः पपात ह ॥ २२ ॥ आपूरितसभालोके शान्ते कुसुमवर्षणे । इमं सिद्धगणालापं शुश्रुवुस्ते सभागताः ॥ २३ ॥ आकल्पं सिद्धसेनासु भ्रमद्भिरभितोदिवम् । अपूर्वमिदमस्माभिः श्रुतं श्रुतिरसायनम् ॥ २४ ॥ यदनेन किलोदारमुक्तं रघुकुलेन्दुना । वीतरागतया तद्धि वाक्पतेरप्यगोचरम् ॥ २५ ॥ अहो बत महत्पुण्यमद्यास्माभिरिदं श्रुतम् । वचो राममुखोद्भूतं महाह्लादकरं धियः ॥ २६ ॥ उपशमामृतसुन्दरमादरा दधिगतोत्तमतापदमेष यत् । कथितवानुचितं रघुनन्दनः सपदि तेन वयं प्रतिबोधिताः ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

रघुकुलरूपी आकाश के उज्ज्वल चन्द्रमा ओर चन्द्रमा के सदृश सुन्दर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी जव उक्त गम्भीर वचन कहकर चुप हो गये तब चारों ओर से उनकी प्रशंसा के पुल बंध गये, वाह वाह से आकाश गूज उठा ओर साथ ही साथ सिद्धो ने आकाश से एेसी घनी पुष्पवृष्टि की कि पुष्पवृष्टि के कारण चारों ओर चँदवा-सा बँध गया । उक्त मन्दार के पुष्पों के मध्य में विश्राम ले रही भँवरों की जोडी की गुनगुनाहट से गुलजार थी, पुष्पवृष्टि की मधुर सुगन्ध ओर सुन्दरता से मनुष्यों का चित्त उनके अधीन नहीं रह गया था। वह पुष्पवृष्टि क्या थी मानों आकाशवायु से गिराये गये तारों की पंक्ति थी, पृथिवी में गिरी हुई अप्सराओं के हास की छटा थी, बरस चुके अतएव तर्जन-गर्जन से रहित और बिजली से देदीप्यमान मेघो के छोटे-छोटे टुकड़ों की झड़ी थी, फेंके गये मक्खन के पिण्डों की परंपरा थी, मोतियों के हारों की राशि के समान विशाल हिमवृष्टि थी, चन्द्रमा के किरणों की माला थी ओर क्षीरसागर के लहरों की श्रेणी थी। उस पुष्पवृष्टि में प्रचुर केसर से पूर्णं कमलो की अधिकता थी ओर उसके चारों ओर भवर मंडराते थे तथा वह स्पर्शसुखसूचक लोगों की सीत्कार ध्वनि से गा रहे, अतिसुगन्धित ओर मन्द होने के कारण सुख स्पर्शवाले वायु से कुछ-कुछ हिल रही थी। उस पुष्पवृष्टि में कहीं पर केतकी के फूल लहलहा रहे थे, तो कहीं पर सफेद कमलो की छटा शोभित हो रही थी, तो कहीं पर कुन्द के फूल अधिक मात्रा मेँ गिर रहे थे ओर कहीं पर केवल नीले कमलों की ही वृष्टि हो रही थी । फूलों की लगातार वृष्टि से आँगन, घर, छत ओर चौतरे सबके सब भर गये थे, नगर के सभी नर-नारी ऊपर गर्दनकर पुष्पवृष्टि की छटा को देखते थे । मेघरहित होने के कारण नीलकमल के सदृश स्वच्छ आकाश से गिरी हुई वह पुष्पवृष्टि अभूतपूर्वं थी, अतएव उसने सभी के चित्त को आश्चर्यमग्न कर दिया था । आकाश में अदृश्य सिद्धों द्वारा की गई उक्त पुष्पवृष्टि आधी घड़ी तक लगातार होती रही । सभा और सभा में स्थित लोगों को आच्छन्न कर उक्त पुष्पवृष्टि के बन्द होने पर सभा में स्थित लोगों ने सिद्धो का आगे कहा गया वार्तालाप सुना : हम लोग सृष्टि के आरम्भ से लेकर स्वर्ग के इस छोर से उस छोर तक अनेकानेक सिद्धो में विचर रहे हैं, पर हमने आज ही कानों को अमृत के समान प्रिय लगनेवाले या वेदों के सारभूत ये वचन सुने हैँ । विरक्त होने के कारण रघुवंशदीपक श्रीरामचन्द्रजी ने जो उदार वचन कहे, उन्हें वाचस्पति भी नहीं कह सकते हैं । खेद है कि जिन लोगों ने ऐसे वाक्य नहीं सुने उनका जन्म वृथा है। यह बड़े सौभाग्य की बात है कि हमें श्रीरामचन्द्रजी के मुखारविन्द से निर्गत एवं चित्त को अत्यन्त आह्वादित करनेवाले ये वचन सुनने को मिले । श्रीरामचन्द्रजी ने शान्तिप्रद, अमृत के समान सुन्दर एवं जाति, कुल, चरित्र, धर्माभिज्ञता आदि द्वारा प्राप्त उत्तमता के द्योतक जो वचन आदरपूर्वक कहे, उनसे हमको भी तुरन्त “स्वर्गं आदि के सुखों में कुछ भी सार नहीं हे", यह ज्ञान हो गया है