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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 32, Verses 1–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 32, verses 1–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 1-11

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । वदत्येवं मनोमोहविनिवृत्तिकरं वचः । रामे राजीवपत्राक्षे तस्मिन्राजकुमारके ॥ १ ॥ सर्वे बभूवुस्तत्रस्था विस्मयोत्फुल्ललोचनाः । भिन्नाम्बरा देहरुहैर्गिरः श्रोतुमिवोद्धुरैः ॥ २ ॥ विरागवासनापास्तसमस्तभववासनाः । मुहूर्तममृताम्भोधिवीचीविलुलिता इव ॥ ३ ॥ ता गिरो रामभद्रस्य तस्य चित्रार्पितैरिव । संश्रुताः श्रृणुकैरन्तरानन्दपदपीवरैः ॥ ४ ॥ वसिष्ठविश्वामित्राद्यैर्मुनिभिः संसदि स्थितैः । जयन्तधृष्टिप्रमुखैर्मन्त्रिभिर्मन्त्रकोविदैः ॥ ५ ॥ नृपैर्दशरथप्रख्यैः पौरैः पारशवादिभिः । सामन्तै राजपुत्रैश्च ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादिभिः ॥ ६ ॥ तथा भृत्यैऽरमात्यैश्च पञ्जरस्थैश्च पक्षिभिः । क्रीडामृगैर्गतस्पन्दैस्तुरंगैस्त्यक्तचर्वणैः ॥ ७ ॥ कौसल्याप्रमुखैश्चैव निजवातायनस्थितैः । संशान्तभूषणारावैरस्पन्दैर्वनितागणैः ॥ ८ ॥ उद्यानवल्लीनिलयैर्विटङ्कनिलयैरपि । अक्षुब्धपक्षततिभिर्विहङ्गैर्विरतारवैः ॥ ९ ॥ सिद्धैर्नभश्चरैश्चैव तथा गन्धर्वकिन्नरैः । नारदव्यासपुलहप्रमुखैर्मुनिपुङ्गवैः ॥ १० ॥ अन्यैश्च देवदेवेशविद्याधरमहोरगैः । रामस्य ता विचित्रार्था महोदारा गिरः श्रुताः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

वासना से उनकी संसार की कारणभूत रागद्वेष आदि सम्पूर्ण वासनाएँ नष्ट हो गई ओर वे क्षणभर के लिए अमृतसागर की तरंगोँ में ओत-प्रोत से हो गये । श्रीरामचन्द्रजी की वे वाणियाँ सुनने में समर्थ लोगों ने ऐसे ध्यान से सुनीं कि वे निश्चलता के कारण चित्रलिखित से प्रतीत होते थे ओर हार्दिक आनन्द से उनका वदन प्रसन्न था। वे सुननेवाले थे, सभा में स्थित वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि मुनि, मन्त्रणा करने में निपुण जयन्त, द्युष्टि आदि दशरथ के मन्त्री, दशरथ आदि राजा महाराज, पर्शु आदि देशों के शासक सामन्त, नगरवासी, भरत आदि राजकुमार, ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण, नौकर-चाकर, अमात्य, पिंजड़े में स्थित पक्षी, निश्चल क्रीडामृग (मनोविनोद के लिए पाले गये मृग), घास-दाना न चवा रहे घोडे, अपने महल के झरोखे पर बैठी हुई, निश्चल अतएव आभूषणओं के शब्दों से रहित कौशल्या आदि रानियाँ, बगीचे की लताओँ में और महल के अग्रभाग में (कबूतर आदि के रहने के स्थान में) रहनेवाले, पंखों को तनिक भी न हिला रहे एवं चुपचाप पक्षी, आकाशचारी सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर एवं नारद, व्यास, पुलह आदि मुनिश्रेष्ठ उक्त महानुभावो ने ओर उनसे अतिरिक्त देवता, दिकपति देवराज आदि, विद्याधर तथा शेषनाग प्रभृति नागों ने श्री रामचन्द्रजीकी विचित्र अर्थो से परिपूर्ण वे उदारतम वाणियाँ सुनीं