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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 31, Verses 16–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 31, verses 16–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 16-19

संस्कृत श्लोक

मनोमननशालिन्याः सत्ताया भुवनत्रये । क्षयो युक्तिं विना नास्ति ब्रूत तामलमुत्तमाम् ॥ १६ ॥ व्यवहारवतो युक्त्या दुःखं नायाति मे यया । अथवा व्यवहारस्य ब्रूत तां युक्तिमुत्तमाम् ॥ १७ ॥ तत्कथं केन वा किं वा कृतमुत्तमचेतसा । पूर्वं येनैति विश्रामं परमं पावनं मनः ॥ १८ ॥ यथा जानासि भगवंस्तथा मोहनिवृत्तये । ब्रूहि मे साधवो येन नूनं निर्दुःखतां गताः ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

(¬ जैसे अरण्य मे प्राप्त आँधी, वृष्टि आदि से उत्पन्न क्लेश की निवृत्ति के लिए छाता, छप्पर, चट्टाई आदि उपाय हैं, पारदगुटिका, ओषधिलेप आदि द्रारा शीघ्र वृष्टिरहित दूर देश में गति (गमन) होती है, संकट से बचानेवाले मन्त्र या देवता आदि का स्मरण होता है, पर्वत की गुफा का आश्रय लिया जाता है, वैसे ही सांसारिक क्लेश की निवृत्ति के लिए भी क्या कोई उपाय, गमन, स्मरण ओर आश्रयण आदि साधन हैं ? यह अभिप्राय है । बाह्य व्यवहार रहे, वह हमारा क्या बिगाड़ सकता है, मनकी चंचलता ही परम दुःख है, अतएव जिससे उसकी चिकित्सा हो, वही उपाय कहिए, ऐसा कहते हैं। मुनिश्रेष्ठ, तीनों भुवनों में मन का विषयों से संसर्ग होना ही मन की सत्ता (अस्तित्व) है और उसका विषयों से सम्पर्क न होना ही उसकी सत्ता का विनाश (मन के अस्तित्वका अभाव) है और मन की सत्ता का विनाश सम्पूर्ण विषयों के बाधक तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति मेँ कारणभूत युक्ति के उपदेश के बिना नहीं हो सकता, इसलिए जब तक मुझ में तत्त्वज्ञान का उदय न हो तब तक मुझे उक्त युक्तिका बारबार उपदेश दीजिये। अथवा जिस युक्ति से, मेरे लोकव्यवहार में रत रहने पर भी, मुझे दुःख प्राप्त न हो, व्यवहार की उस उत्तम युक्ति का आप मुझे उपदेश दीजिये । युक्ति से मोह का (अज्ञान का) निराकरण पहले किस उत्तम चित्तवालेने किया और किस प्रकार किया ? जिससे चित्त पवित्र होकर परम शान्ति को प्राप्त होता हे । मोह की निवृत्ति के लिए जो कुछ आपको जानकारी हो उसे कृपाकर किये, जिसके अवलम्बन से अनेक साधु-सन्त पुरुष निर्वाण को प्राप्त हो गये हे