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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 28, Verses 31–43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 28, verses 31–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 31-43

संस्कृत श्लोक

आपदः क्षणमायान्ति क्षणमायान्ति संपदः । क्षणं जन्म क्षणं मृत्युर्मुने किमिव न क्षणम् ॥ ३१ ॥ प्रागासीदन्य एवेह जातस्त्वन्यो नरो दिनैः । सदैकरूपं भगवन्किंचिदस्ति न सुस्थिरम् ॥ ३२ ॥ घटस्य पटता दृष्टा पटस्यापि घटस्थितिः । न तदस्ति न यद्दृष्टं विपर्यस्यति संसृतौ ॥ ३३ ॥ तनोत्युत्पादयत्यत्ति निहत्यासृजति क्रमात् । सततं रात्र्यहानीव निवर्तन्ते नरं प्रति ॥ ३४ ॥ अशूरेण हतः शूर एकेनापि हतं शतम् । प्राकृताः प्रभुतां याताः सर्वमावर्त्यते जगत् ॥ ३५ ॥ जनतेयं विपर्यासमजस्रमनुगच्छति । जडस्पन्दपरामर्शात्तरङ्गाणामिवावली ॥ ३६ ॥ बाल्यमल्पदिनैरेव यौवनश्रीस्ततो जरा । देहेऽपि नैकरूपत्वं कास्था बाह्येषु वस्तुषु ॥ ३७ ॥ क्षणमानन्दितामेति क्षणमेति विषादिताम् । क्षणं सौम्यत्वमायाति सर्वस्मिन्नटवन्मनः ॥ ३८ ॥ इतश्चान्यदितश्चान्यदितश्चान्यदयं विधिः । रचयन्वस्तुनायाति खेदं लीलास्विवार्भकः ॥ ३९ ॥ चिनोत्युत्पादयत्यत्ति निहत्यासृजति क्रमात् । सततं रात्र्यहानीव निवर्तन्ते नरं प्रति ॥ ४० ॥ आविर्भावतिरोभावभागिनो भवभागिनः । जनस्य स्थिरतां यान्ति नापदो न च संपदः ॥ ४१ ॥ कालः क्रीडत्ययं प्रायः सर्वमापदि पातयन् । हेलाविचलिताशेषचतुराचारचञ्चुरः ॥ ४२ ॥ समविषमविपाकतो विभिन्नास्त्रिभुवनभूतपरम्पराफलौघाः । समयपवनपातिताः पतन्ति प्रतिदिनमाततसंसृतिद्रुमेभ्यः ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

को परमात्मा वृद्धि को प्राप्त कराता है, विपरिणाम को प्राप्त कराता है, क्षीण करता है, नष्ट करता है ओर फिर जन्म को प्राप्त कराता है । क्रम से वृद्धि विपरिणाम, अपक्षय, विनाश और जन्म को प्राप्त हो रहे देहाभिमानी के समीप ये पाँच भावविकार भी चिरकाल तक नहीं रहते, रात्रि ओर दिन के समान निवृत्त हो जाते हैं अर्थात्‌ विपर्यय को प्राप्त हो जाते है । भाव यह कि रात्रि ओर दिन के समान उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि, हास और विनाश क्रम से मनुष्य को प्राप्त होते है, प्राप्त होकर स्थिर, नहीं रहते, किन्तु पुनः पुनः परिवर्तित होते रहते हैं | बलवान्‌ दुर्बल के द्वारा मारा जाता है, एक व्यक्ति भी सैकड़ों व्यक्तियों को धराशायी बना देता हे एवं सामान्य व्यक्ति भी प्रभुता को प्राप्त हो जाते हैँ । बहुत क्या कहें सारा जगत्‌ ही परिवर्तनशील है । जैसे जल का वेग क्रिया के साथ संपर्कं होने से तरगों की पंक्तियाँ लगातार परिवर्तित होती हैं, वैसे ही यह जनता (चेतनप्राणिसमूह) भी जड प्राण, इन्द्रिय आदि के संसर्ग से निरन्तर परिवर्तित होती हे । बाल्यावस्था थोड़े ही दिनों मे चली जाती है, तदन्तर यौवन पदार्पण करता है, वह भी बाल्यावस्था के अनुसार थोड़े ही दिनों में चल बसता है, तदुपरान्त वृद्धावस्था आती हे । देखिए, देह में भी एकरूपता (स्थिरता) नहीं है, बाह्य पदार्थो में तो एकरूपता की क्या आशा हो सकती है? जैसे नट हर्ष, विषाद आदि का अभिनय करता हे, वैसे ही मन भी हर्ष, विषाद का अभिनय करता है, कभी वह किसी विषय को देखकर आनन्द को प्राप्त होता है, क्षणभर में ही अन्य को देखकर दुःखी बन जाता है ओर क्षणभर मेँ सौम्य बन जाता हे । जैसे बालक खेल क्रीडा मेँ कभी कुछ, कभी कुछ वस्तु बनाता हुआ थकता नहीं, वैसे ही यह विधाता भी इधर दूसरी, उधर दूसरी ओर उधर दूसरी वस्तु को बनाता हुआ खेद को प्राप्त नहीं होता, कभी थकता नहीं । विधाता मनुष्यों को धान आदि के समान संचित कर बढ़ाता है, उनसे अन्य लोगों की (पुत्र-पौत्रादिरूप से) उत्पत्ति कराता है; फिर उनको मारकर खा जाता हे । उनको खाने में उसे स्वाद मिल जाता है, फिर तो वह निरन्तर खाने के लिए अन्य लोगों की सृष्टि करता हे सृष्टि को प्रप्त मनुष्यों के पास हर्ष, विषाद आदि रात्रि ओर दिन की नाई सदा आते जाते रहते हैं| उत्पन्न ओर विनष्ट होनेवाले संसारी पुरुषों की न तो आपत्तियाँ स्थिर रहती हैं ओर न सम्पत्तियाँ ही स्थिर रहती हे । यह काल समर्थो को भी अनादर के साथ परिवर्तित करनेमें अति दक्ष हे । यह प्रायः सब लोगों को आपत्ति में ढकेल कर क्रीडा करता है । कर्मो के एवं रसो के सम परिणाम ओर विषम परिणाम से विविध भाँति के तीनों लोकों के प्राणी समुदायरूप फल समयरूपी वायु द्वारा आन्दोलित होकर विस्तृत संसाररूपी वृक्षों से प्रतिदिन गिरते है