Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अगस्तिरुवाच ।
उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणां गतिः ।
तथैव ज्ञानकर्मभ्यां जायते परमं पदम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
"यत्र दुःखेन सम्भिन्नम् इत्यादि श्रुति से स्वर्ग मे नित्यत्व आदिका परिज्ञान होता है, वास्तव में
अनेक श्रुतियों के साथ विरोध होने से स्वर्ग मेँ नित्यत्व आदिका श्रवण आपेक्षिक है अर्थात् जितने
उपाधि में प्रविष्ट होकर तप्त लोहपिण्ड में अग्नि के समान तादात्म्य के अध्यास से अन्तःकरण की जडता
को दूरकर उसे प्रकाशन -सामर्थ्य देता हुआ ज्ञाता कहलाता है । वही चिनगारियों के समान अन्तःकरण
की वृत्तियों को प्रकाशन-सामर्थ्य देने से ज्ञान कहलाता है । वृत्ति के विषयाकार होने पर स्वयं भी वृत्ति
द्वारा विषयाकार हुआ-सा ज्ञेय कहलाता है । वही ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा द्रष्टा कहलाता है । और इन्द्रिय-
सम्प्रयोग से उत्पन्न इन्द्रियवृत्ति के द्वारा दर्शन कहलाता है । वृत्ति के फलरूप से विषयों को व्याप्त कर
तद्रूप से स्वयं भी दृश्य-सा हो जाता है, अतः दृश्य कहलाता है । कर्मेन्द्रिय, प्राण ओर शरीर के द्वारा कर्ता
कहलाता है । फल का भोक्ता होने से क्रिया की उत्पत्ति में निमित्त होने के कारण हेतु कहलाता है । क्रिया
की न्यूनता ओर अधिकता में “मैं ही न्यून या अधिक हूँ” ऐसा क्रिया के विषय मेँ अभिमान करने से क्रिया
कहलाता है । उक्त अर्थ में "एष हि दरष्टा श्रोता मन्ता कर्ता बोद्धा विज्ञानात्मा पुरुषः प्राणन्नेव प्राणो नाम
भवति" इत्यादि श्रुति प्रमाण है ।
२8 परम पुरुषार्थभूत ब्रह्मानन्द ही यहाँ मोक्षशब्द का अर्थ है । उसका पर्यवसान स्वर्ग में ही होता है, क्योकि
“यन्न दुःखेन सम्मिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलाषोपनीतंच तत्सुखं स्वःपदास्पदम् ॥* जो किसी प्रकार
के दुःख से सम्बन्ध नरखनेवाला, निरतिशय, अविनाशी एवं अभिलाषा करते ही प्राप्त होनेवाला सुख है, उसी
को स्वर्ग कहते हैं। इस श्रुति से तथा 'स स्वर्गः सर्वान्प्रत्यविशिष्टत्वात्" उस स्वर्ग को सभी लोग चाहते हैँ ।
अनित्य या दुःखमिश्रित पदार्थ हैं, उनसे स्वर्ग अधिक स्थायी है और उसमें दुःख का मिश्रण भी कम है,
अत: असम्भव होने से प्रथम प्रश्न निरर्थक है। रह गई द्वितीय और तृतीय प्रश्न की बात, उसमें चित्तशुद्धि
के द्वा कर्म के ज्ञानांग होने पर भी श्रुति-तात्पर्य के साथ विरोध न होने के कारण ज्ञान और कर्म को
अभिन्न मान कर अगस्त्य मुनि सुतीक्ष्ण ब्राह्मण के प्रश्न का उत्तर देते हैं।
अगस्त्य मुनि ने कहा : जैसे आकाश में दोनों ही पंखों से पक्षी उड़ते हैं, एक से नहीं, वैसे ही
ज्ञान और कर्म दोनों से परमपद की प्राप्ति होती है । तात्पर्य यह है कि जैसे आकाश-मार्ग से
जानेवाले पक्षी अपने अभीष्ट देश में जाने के लिए दो पंखों के द्वारा ही उड़ कर जा सकते हैं, एक
से नहीं; वैसे ही "तद्विष्णोः परमं पदम्" इत्यादि श्रुति से जिस परमपदरूप कैवल्य का वर्णन किया
गया है, उसको अधिकारी लोग अपने आत्मा में ही ज्ञान और कर्म दोनों से प्राप्त कर लेते हैं, अतः
ज्ञान और (0) कर्म दोनों मोक्ष के कारण हैं