Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 50–51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verses 50–51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 50-51
संस्कृत श्लोक
राजोवाच ।
भगवन्धर्मतत्त्वज्ञ ज्ञातज्ञेय विदांवर ।
कृतार्थोऽहं भवद्दृष्ट्या तदेव कुशलं मम ॥ ५० ॥
भगवन्प्रष्टुमिच्छामि तदविघ्नेन मे वद ।
संसारबन्धदुःखार्तेः कथं मुञ्चामि तद्वद ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा ने कहा : भगवन् आप सब धर्मो के तत्त्वों को जानते हैं और
जितने ज्ञातव्य विषय हैं उन सबके आप ज्ञाता हैं, मैं आपके दर्शन से कृतार्थ हूँ, यही मेरी कुशल हे ।
भगवन् ! इस समय मैं जिज्ञासु ओर संसारदुःख से कातर हूँ। जिस भाँति विघ्न न आवे वैसे मुझे तत्त्व का
उपदेश दीजिये । जिससे मैं संसार-बन्धनरूप पीडा से मुक्त हो जाऊँ