Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 27–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verses 27–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 27-31
संस्कृत श्लोक
देवदूत उवाच ।
शृणु भद्रे यथावृत्तं विस्तरेण वदामि ते ।
तस्मिन्राज्ञि वने तत्र तपश्चरति दुस्तरम् ॥ २७ ॥
इत्यहं देवराजेन सुभ्रूराज्ञापितस्तदा ।
दूत त्वं तत्र गच्छाशु गृहीत्वेदं विमानकम् ॥ २८ ॥
अप्सरोगणसंयुक्तं नानावादित्रशोभितम् ।
गन्धर्वसिद्धयक्षैश्च किन्नराद्यैश्च शोभितम् ॥ २९ ॥
तालवेणुमृदङ्गादि पर्वते गन्धमादने ।
नानावृक्षसमाकीर्णे गत्वा तस्मिन्गिरौ शुभे ॥ ३० ॥
अरिष्टनेमिं राजानं दूतारोप्य विमानके ।
आनय स्वर्गभोगाय नगरीममरावतीम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
देवदूत ने कहा : हे
सुन्दरी, सुनो, मैं विस्तार से तुम्हें वहाँ की घटना सुनाता हू । राजा अरिष्टनेमि गन्धमादन पर्वत में
कठिन तपस्या कर रहा है, यह जानकर देवराज इन्द्र ने मुझे आज्ञा दी कि हे दूत, तुम अप्सराओं ओर
विविध बाजों से सुशोभित, गन्धर्व, सिद्ध, किन्नर आदिसे विभूषित विमान को एवं ताल आदि से सज्जित
सेना को लेकर अनेक प्रकार के वृक्षों से शोभित गन्धमादन पर्वत पर जाओ और राजा अरिष्टनेमि को
विमान पर बैठा कर स्वर्गसुख भोगने के लिए अमरावती पुरी में ले आओ