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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 14–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verses 14–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 14-16

संस्कृत श्लोक

कारुण्य उवाच । यावज्जीवमग्निहोत्रं नित्यं संध्यामुपासयेत् । प्रवृत्तिरूपो धर्मोऽयं श्रुत्या स्मृत्या च चोदितः ॥ १४ ॥ न धनेन भवेन्मोक्षः कर्मणा प्रजया न वा । त्यागमात्रेण किंत्वेके यतयोऽश्नन्ति चामृतम् ॥ १५ ॥ इति श्रुत्योर्द्वयोर्मध्ये किं कर्तव्यं मया गुरो । इति संदिग्धतां गत्वा तूष्णींभूतोऽस्मि कर्मणि ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने पिता के यों पूछने पर कारुण्य ने कहा : श्रुति ओर स्मृतियों ने जीवनपर्यन्त अग्निहोत्र, सन्ध्यावन्दन आदि प्रवृत्तिरूप धर्मो का विधान या प्रतिपादन किया है एवं “धन से, कर्म से तथा प्रजाओं के उत्पादन से अमृतरूप मोक्ष प्राप्त नहीं होता, मुख्य-मुख्य यति लोग एकमात्र त्याग से मोक्ष प्राप्त करते है, ऐसे अर्थ का प्रतिपादन करनेवाली "न धनेन" इत्यादि श्रुति मुक्तिप्राप्ति के लिए केवल त्याग को ही साधन बतलाती हे । इसलिए पूज्यवर, इन परस्पर विरुद्ध अर्थो में से किसका मुझे अनुसरण करना चाहिए ? यों सन्देह में पड़कर मैं कर्मानुष्ठान से उदासीन हुआ हूँ