Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 159
एक सौ सत्तावनवाँ सर्ग समाप्त एक यौ अद्जावनवाँ सर्ग मुनिजी का वचन सुनकर व्याध का तप करना, ब्रह्माजी के वरदान से आकाश में उड़ना तथा शव होकर भूमि पर गिरना आदि का वर्णन ।
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- Verses 1–3मुनिजी ने कहा : हे व्याध, यह सब भविष्य में होनेवाली घटनाका अतीत की तरह मैंने तुमसे वर्णन…
- Verses 4–12इसके अनन्तर मुनिजी तो थोड़े ही समय में मुक्ति को प्राप्त हो गये। वे आयु के अवसान में अपनी…
- Verses 13–70सैकड़ों मेरु पर्वतं के से आकार का उसका शरीर महाशव सा हुआ । दूसरी पृथ्वी के सदृश विशालकाय…