Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 72, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 72, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
रम्भास्तम्भो यथा पत्रमात्रमेवान्तरान्तरम् ।
अन्तरन्तस्तथेदं हि विश्वं ब्रह्म विवर्त्यपि ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
^रम्भास्तम्भो यथा पत्रम्“ इस चौथे प्रश्न का उत्तर देते हैं।
जैसे केले का स्तम्भ भीतर-भीतर ज्यों - ज्यों नोंचा जाता है त्यों -त्यों उसमें केवल पत्र ही मिलता
जाता है वैसे ही ब्रह्म में विवर्तनशील तथा अवान्तर कारणों मे परिणामशील यह विश्व ज्यों-ज्यों
भीतर-भीतर देखा जाता है, त्यों -त्यों उसमे ब्रह्मात्र मिलता जाता है अतः वह अणु हे